दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने पुलिस हिरासत में होने वाली अप्राकृतिक मौतों को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि हिरासत में किसी भी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु, चाहे वह आत्महत्या ही क्यों न हो, केवल निजी घटना नहीं मानी जा सकती। अदालत ने इसे राज्य और पुलिस की जिम्मेदारी से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला बताया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में मौजूद व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि हिरासत के दौरान किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मौत होती है, तो उससे जुड़े मामलों में राज्य अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकता। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह मृतक के पिता को आठ सप्ताह के भीतर 18.44 लाख रुपये का मुआवजा अदा करे। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में पीड़ित परिवार को उचित राहत मिलना आवश्यक है।

दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला वर्ष 2018 में करावल नगर थाने में हुई एक युवक की मौत से जुड़े मामले में आया है। अदालत में दायर याचिका के अनुसार, मृतक दीपक के पिता श्याम सुंदर ने दावा किया था कि उनके बेटे को 15 जनवरी 2018 को एक एफआईआर के सिलसिले में करावल नगर थाना पुलिस ने हिरासत में लिया था। याचिका में बताया गया कि हिरासत में लिए जाने के अगले दिन पुलिस ने फोन के माध्यम से परिवार को सूचना दी कि दीपक ने थाने में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। इसके बाद उसे तत्काल जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

पुलिस पर मारपीट और रिश्वत मांगने के आरोप

याचिकाकर्ता श्याम सुंदर ने अदालत में आरोप लगाया कि जब वह अपने बेटे दीपक से मिलने के लिए थाने पहुंचे, तो पुलिस ने उन्हें भी कई घंटों तक थाने में बैठाए रखा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनके और उनके बेटे, दोनों के साथ मारपीट की। याचिका में यह दावा भी किया गया कि पुलिसकर्मियों ने दीपक को छोड़ने के बदले पैसों की मांग की थी। इन आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ता ने हिरासत में हुई मौत और पुलिस की कथित भूमिका की निष्पक्ष जांच तथा न्याय की मांग की।

हाईकोर्ट ने तय की राज्य की जवाबदेही, सरकार की दलील खारिज

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार ने अदालत में दलील दी कि पुलिस हिरासत में होने वाली हर मौत के मामले में मुआवजा देना अनिवार्य नहीं है, विशेषकर तब जब मृत्यु का कारण कथित तौर पर आत्महत्या हो। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लिया जाता है, तो उसकी सुरक्षा और जीवन की पूरी जिम्मेदारी राज्य की होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिरासत में होने वाली किसी भी अप्राकृतिक मृत्यु को केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था और न्याय प्रणाली की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

18.44 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश

मुआवजे की राशि तय करते समय हाईकोर्ट ने मृतक की अनुमानित मासिक आय 12,000 रुपये मानी। इसके आधार पर भविष्य की संभावित आय (फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स), अंतिम संस्कार के खर्च और अन्य स्वीकार्य मदों को जोड़ते हुए अदालत ने कुल 18.44 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया। अदालत ने अपने आदेश में दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि यह पूरी मुआवजा राशि आठ सप्ताह के भीतर मृतक के पिता को अदा की जाए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में हुई अप्राकृतिक मौत के मामलों में राज्य की जवाबदेही सुनिश्चित करना कानून के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है।

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