दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने दिल्ली की तीन झुग्गी बस्तियों को हटाने का रास्ता साफ कर दिया है। प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास लोक कल्याण मार्ग और एयर फोर्स स्टेशन के नजदीक स्थित इन बस्तियों को खाली कराने की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटाना ‘आश्रय और आजीविका के अधिकार’ का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, बशर्ते प्रभावित लोगों का पुनर्वास उचित तरीके से किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक और सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे को स्थायी अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य की जिम्मेदारी है कि विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए तय नियमों और नीतियों का पालन किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि पुनर्वास प्रक्रिया मानवीय और कानून के अनुरूप हो। यह मामला प्रधानमंत्री आवास और एयर फोर्स स्टेशन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास बनी झुग्गी बस्तियों से जुड़ा था, जिन्हें सुरक्षा और सार्वजनिक हित के मद्देनजर हटाने की मांग की गई थी।
अदालत ने भाई राम कैंप, डीआईडी कैंप और मस्जिद कैंप के निवासियों को हटाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की बेंच ने कहा कि इन बस्तियों के निवासियों को अक्टूबर 2025 में पहला नोटिस जारी किया गया था और तब से पर्याप्त समय बीत चुका है। अदालत ने माना कि सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटाना ‘आश्रय और आजीविका के अधिकार’ का उल्लंघन नहीं है, यदि प्रभावित लोगों का पुनर्वास नियमानुसार किया जाए।
अदालत ने सरकार द्वारा उठाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं उचित और गंभीर हैं। अदालत ने माना कि संबंधित क्षेत्र संरक्षित इलाके में आता है और यह एक एयरफोर्स स्टेशन के बेहद करीब स्थित है। ऐसे में अवैध निर्माणों को हटाने का फैसला रक्षा ढांचे की सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण सुरक्षा उद्देश्यों को ध्यान में रखकर लिया गया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “मौजूदा भू-राजनीतिक घटनाओं को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं याचिकाकर्ताओं को बेदखल करने के लिए पर्याप्त आधार हैं।” अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को ‘आश्रय और आजीविका के अधिकार’ के नाम पर स्थायी संरक्षण नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब मामला संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों से जुड़ा हो।
झुग्गीवासी क्यों दूसरी जगह नहीं जाना चाहते
हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने सवदा घेवर्रामें पुनर्वास का विरोध करते हुए कहा था कि नया स्थान उनके कार्यस्थलों और बच्चों के स्कूलों से काफी दूर है, जिससे आजीविका और शिक्षा प्रभावित होगी। इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील सैयद अब्दुल हसीब ने अदालत को बताया कि आसपास के इलाके में वैकल्पिक आवास उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से तीनों झुग्गी बस्तियों में रहने वाले 717 निवासियों को सावदा घेवर्रा में पुनर्वासित करने का निर्णय लिया गया। अदालत ने पुनर्वास प्रक्रिया को लेकर संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिया कि पुनर्वास स्थलों पर पानी, स्वच्छता, स्कूल और अन्य मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं, ताकि विस्थापित लोगों को जरूरी सुविधाओं की कमी का सामना न करना पड़े।
नए स्थान पर प्रभावित लोगों को कम से कम समस्याएं हों, इसके लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि DUSIB की पुनर्वास नीति का पूरी तरह पालन किया जाए। अदालत ने कहा कि जिन लोगों ने अभी तक वैकल्पिक आवंटन स्वीकार नहीं किया है, वे दस्तावेजों के सत्यापन के तुरंत बाद आवंटित फ्लैट ग्रहण करें। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अब तक 192 निवासियों ने आवंटन पत्र स्वीकार कर लिए हैं, जबकि 136 परिवार आवंटित फ्लैटों में शिफ्ट भी हो चुके हैं।
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