संदीप शर्मा, विदिशा। स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज मामला सामने आया है। विदिशा के शासकीय अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में भ्रष्टाचार का बड़ा खेल खेले जाने की आशंका जताई जा रही है। आरोप है कि कॉलेज प्रशासन और आउटसोर्सिंग कंपनी की मिलीभगत से हर महीने ऐसे कर्मचारियों के नाम पर लाखों रूपए का वेतन निकाला जा रहा है जो हैं ही नहीं।
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कागजों पर 600, जमीन पर सिर्फ 400 कर्मचारी
मेडिकल कॉलेज के सरकारी रिकॉर्ड में कुल 600 आउटसोर्स कर्मचारी तैनात दिखाए गए हैं लेकिन जब जमीनी हकीकत की पड़ताल की गई तो मौके पर केवल 400 कर्मचारी ही काम कर रहे हैं। यानि 200 कर्मचारी ऐसे हैं जिनका नाम तो है पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इन 200 गायब कर्मचारियों का वेतन हर महीने किसकी जेब में जा रहा है?
डीन और आउटसोर्स कंपनी की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस पूरे महाघोटाले में मेडिकल कॉलेज के डीन और कर्मचारियों की सप्लाई करने वाली निजी आउटसोर्स कंपनी की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध मानी जा रही है। नियम के अनुसार कर्मचारियों का वेतन जारी करने में डीन की मुख्य और अंतिम भूमिका होती है। ऐसे में बिना शीर्ष अधिकारियों की मर्जी या मिलीभगत के इतनी बड़ी राशि का हर महीने निकाला जाना मुमकिन नहीं है।
लाखों रुपये की मासिक चपत का अनुमान
अगर इस घोटाले के गणित को समझें तो एक आउटसोर्स कर्मचारी का औसतन वेतन लगभग 10 से 12 हजार रुपये प्रति माह होता है। इस हिसाब से गायब चल रहे 200 कर्मचारियों के नाम पर हर महीने 20 लाख से 24 लाख रुपये की सरकारी राशि का गबन किया जा रहा है।
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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) की एंट्री
इस बड़े फर्जीवाड़े की भनक जैसे ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक को लगी। उन्होंने तुरंत मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे संज्ञान में ले लिया है। आयोग ने इस पूरे तंत्र और अधिकारियों की सांठगांठ को लेकर गहरी चिंता जताई है और मामले की बड़े स्तर पर निष्पक्ष जांच कराने की बात कही है।
इस मामले के सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन में हड़कंप मचा हुआ है। अब ऐसे में देखना यह होगा कि जांच की आंच कहां तक पहुंचती हैं और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले इन सफेदपोश चेहरों पर क्या कार्रवाई होती है।

