चंडीगढ़। न्यायपालिका को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के मामले पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि अफसरशाही के लिए फुर्ती फिर अदालतों के लिए सुस्ती क्यों है। मोगा, मोहाली और पठानकोट में न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे की बदहाल स्थिति पर हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार के चीफ सेक्रेटरी (सीएस) से जवाब मांगा है।
चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने पंजाब सरकार से पूछा कि जब कार्यपालिका के लिए भवन, आवास और सुविधाएं तेजी से उपलब्ध करा दी जाती हैं तो न्यायपालिका को आवश्यक ढांचा देने में वर्षों कहीं कहीं दशकों की देरी क्यों होती है। हाईकोर्ट न्यायिक आधारभूत संरचना की कमी को लेकर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पंजाब के तीन जिलों मोगा, एसएएस नगर (मोहाली) और पठानकोट की स्थिति को उदाहरण बनाकर सरकार की कार्यशैली पर गंभीर असंतोष जताया। कोर्ट ने कहा कि मोगा को 1995 में जिला बनाए जाने के बावजूद नए न्यायिक कोर्ट परिसर के लिए 76 कनाल 1 मरला भूमि अधिग्रहण का निर्णय लगभग 20 वर्ष बाद 2015 में लिया गया। इसके बाद मार्च 2018 में हाईकोर्ट की बिल्डिंग कमेटी ने 59 कनाल 7 मरला अतिरिक्त भूमि की मांग की लेकिन आठ वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी यह प्रक्रिया अंतिम रूप नहीं ले सकी।
मोहाली के मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2006 में जिला बनने के लगभग दो दशक बाद जाकर न्यायिक आवासों के लिए स्वीकृत 10.21 एकड़ भूमि में से केवल 6.237 एकड़ आवंटित की गई। कोर्ट ने इसे न्यायिक जरूरतों के प्रति प्रशासनिक उदासीनता का उदाहरण माना।
पठानकोट को लेकर कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2011 में जिला बनने के बाद न्यायिक कॉलोनी के लिए चयनित भूमि संरक्षित वन भूमि निकली। मार्च 2026 में कैबिनेट मंत्री की अध्यक्षता में बैठक हुई, वैकल्पिक स्थल भी चिन्हित हुआ लेकिन अदालत ने कहा कि 15 वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस है। कोर्ट ने कहा कि पंजाब के सीएस को 15 मई तक हलफनामा दाखिल कर पूछा है कि न्यायपालिका के लिए बुनियादी सुविधाओं में देरी के पीछे वास्तविक कारण क्या है।
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