Automobile Desk: भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग अब महज घरेलू जरूरतों को पूरा करने या दूसरे देशों से होने वाले आयात पर निर्भरता घटाने तक सीमित नहीं रहने वाला है। देश का ऑटो सेक्टर अब वैश्विक स्तर पर विनिर्माण, नई तकनीकों और रिसर्च का प्रमुख केंद्र बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस सेक्टर का लक्ष्य अब दुनिया के बाजारों में अपनी मजबूत धाक जमाना और टेक्नोलॉजी लीडरशिप हासिल करना है।

ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस को बनाना होगा मूल मंत्र

ऑटोमोटिव कॉम्पोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के हालिया कार्यक्रम में सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के अध्यक्ष शैलेश चंद्रा ने ऑटो इंडस्ट्री के उज्ज्वल भविष्य और इसकी भावी रणनीतियों की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय ऑटो सेक्टर ने बीते वर्षों में शानदार प्रदर्शन करते हुए निर्यात के मोर्चे पर बड़ी सफलता हासिल की है। हालांकि, अब वक्त आ गया है कि इंडस्ट्री अपनी क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाए और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस (Global Competitiveness) को अपना मूल मंत्र बनाए।

‘मेड इन इंडिया’ की पहचान बदलने की जरूरत

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ का मतलब अब सिर्फ किफायती या कम कीमत वाले उत्पाद नहीं होना चाहिए। वैश्विक पटल पर भारत की पहचान उच्च गुणवत्ता, भरोसेमंद प्रोडक्ट, अत्याधुनिक तकनीक और विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा से बननी चाहिए। भारतीय ऑटो उद्योग को अब ‘मेक इन इंडिया’ के दायरे से बाहर निकलकर एक व्यापक मॉडल पर काम करना होगा, जिसमें ‘डिजाइन इन इंडिया, डेवलप इन इंडिया, मैन्युफैक्चर इन इंडिया और एक्सपोर्ट फ्रॉम इंडिया’ शामिल है। इसका सीधा अर्थ यह है कि गाड़ियों और उनके स्पेयर पार्ट्स का केवल प्रोडक्शन भारत में न हो, बल्कि उनकी पूरी डिजाइनिंग, रिसर्च, नई तकनीकों की खोज और डेवलपमेंट का काम भी देश की धरती पर ही अंजाम दिया जाए।

डिजाइन और R&D पर फोकस

किसी भी वाहन या उसके ऑटो कॉम्पोनेंट की कुल वैल्यू में उसकी डिजाइनिंग और आरएंडडी (R&D) की सबसे अहम भूमिका होती है। भारत के पास वर्तमान में एक विशाल और तेजी से उभरता हुआ घरेलू ऑटो बाजार मौजूद है। इस बड़े यूजर बेस का फायदा उठाकर भारतीय कंपनियां अपनी तकनीकी क्षमताओं और रिसर्च नेटवर्क को और अधिक सशक्त बना सकती हैं।

आत्मनिर्भरता का अर्थ खुद को वैश्विक बाजार से अलग थलग कर लेना बिल्कुल नहीं है। भारत को वैश्विक वैल्यू चेन से कटने के बजाय उसका एक अनिवार्य और मजबूत हिस्सा बनना होगा। देश में एक ऐसा सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की आवश्यकता है जो केवल स्थानीय जरूरतों तक सीमित न रहकर दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील बाजारों की मांगों को भी बराबरी के साथ पूरा कर सके। इसके लिए सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग, उन्नत टेक्नोलॉजी और सख्त क्वालिटी कंट्रोल पर लगातार निवेश और सुधार की जरूरत बनी रहेगी।

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