संबलपुर : भारतीय जन स्वास्थ्य संघ (IPHA) की ओडिशा शाखा ने सरकार से राज्य भर के नर्सिंग होम और अस्पतालों में शिशु दूध के विकल्प, दूध की बोतलें और शिशु आहार (उत्पादन, आपूर्ति और वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992 को सख्ती से लागू करने का आग्रह किया है।
विश्व स्तनपान सप्ताह के अवसर पर रविवार को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मुकेश महालिंग को लिखे एक पत्र में, संघ ने कानून द्वारा प्रतिबंध के बावजूद कृत्रिम शिशु आहार के प्रचार, आपूर्ति और उपयोग पर चिंता व्यक्त की।
इसमें आगे बताया गया कि शिशु दूध के विकल्पों के आक्रामक चिह्नांकन और अप्रत्यक्ष प्रचार ने न केवल स्तनपान के प्रयासों को कमजोर किया है, बल्कि नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को भी खतरे में डाला है। पत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि नर्सिंग होम में ‘बड़े पैमाने पर उल्लंघन’, कमजोर प्रवर्तन और नियमित निरीक्षण की कमी ने कंपनियों और संस्थानों को कानून की अनदेखी करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
आईपीएचए-ओडिशा के महासचिव और वीआईएमएसएआर, बुर्ला के डॉक्टर संजीव मिश्रा ने कहा कि स्तनपान स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव विकास में एक राष्ट्रीय निवेश है।
उन्होंने आईएमएस अधिनियम को अक्षरशः लागू करने का अनुरोध करते हुए कहा, “कृत्रिम आहार के स्वास्थ्य जोखिमों पर व्यापक शोध से पता चला है कि कृत्रिम शिशु आहार बच्चों में संक्रमण, एलर्जी, कुपोषण और यहाँ तक कि मधुमेह व मोटापे जैसी दीर्घकालिक बीमारियों के जोखिम को बढ़ाता है।”

एसोसिएशन ने राज्य में प्रत्येक नवजात शिशु के अधिकारों और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नियमित निरीक्षण, उल्लंघनकर्ताओं के विरुद्ध कड़ी दंडात्मक कार्रवाई और जागरूकता अभियान चलाने का आह्वान किया।
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