दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने पासपोर्ट (passport) जारी करने या उसके नवीनीकरण को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट (PVR) का नेगेटिव होना पासपोर्ट जारी करने या उसे रिन्यू करने से इनकार करने का वैध आधार हो सकता है। पासपोर्ट अथॉरिटी किसी आवेदन पर विचार करते समय पुलिस की वेरिफिकेशन रिपोर्ट पर भरोसा कर सकती है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा (Justice Swarna Kanta) ने 5 सितंबर को दिए अपने फैसले में कहा कि पासपोर्ट अथॉरिटी को किसी भी आवेदन और उसके सामने उपलब्ध जानकारी पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए। हालांकि, अथॉरिटी पुलिस अधिकारियों की ओर से की गई तथ्यों की जांच को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती।

पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट को नजरअंदाज करना सही नहीं

कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर पासपोर्ट अथॉरिटी के पास पुलिस की तरह बैकग्राउंड जांच करने का कोई स्वतंत्र तरीका नहीं होता। ऐसे में पासपोर्ट जारी करने या रिन्यू करने का फैसला लेते समय पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर पासपोर्ट अथॉरिटी की निर्णय प्रक्रिया को गलत नहीं ठहराया जा सकता कि उसने पुलिस की नेगेटिव वेरिफिकेशन रिपोर्ट पर भरोसा किया। कोर्ट के मुताबिक, निर्णय लेने की प्रक्रिया में PVR को महत्व न देना भी उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी अपने अधिकार क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाए रखना और संबंधित व्यक्ति का वेरिफिकेशन करना है। इसलिए उनके द्वारा तैयार की गई वेरिफिकेशन रिपोर्ट को पासपोर्ट अथॉरिटी के निर्णय में प्रासंगिक माना जा सकता है।

ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे भारतीय छात्र ने दी थी चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले की सुनवाई कैनबरा स्थित ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र की याचिका पर कर रहा था। छात्र ने जॉइंट सेक्रेटरी (PSP) और चीफ पासपोर्ट ऑफिसर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसका पासपोर्ट रिन्यूअल आवेदन खारिज कर दिया गया था। छात्र ने बताया कि उसने 1 फरवरी 2024 को पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए आवेदन किया था। उसके मुताबिक, आवेदन करीब 18 महीने तक बिना कोई कारण बताए या निर्णय किए लंबित रहा। दिसंबर 2025 में कैनबरा स्थित भारतीय हाई कमीशन ने नेगेटिव पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट (PVR) का हवाला देते हुए उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद चीफ पासपोर्ट ऑफिसर के समक्ष दायर उसकी अपील भी 10 मार्च को खारिज कर दी गई। इसके बाद छात्र ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि पासपोर्ट आवेदन खारिज करने वाले आदेश में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई, जिससे यह पता चल सके कि पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(b) में दिए गए इनकार के आधार इस मामले में कैसे लागू होते हैं। उसने दावा किया कि आवेदन खारिज करने का फैसला केवल नेगेटिव पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट पर आधारित था, लेकिन यह रिपोर्ट उसे उपलब्ध ही नहीं कराई गई। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि अपीलीय प्राधिकरण ने मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया। उसका कहना था कि पुलिस रिपोर्ट का खुलासा नहीं करने और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं देने के कारण कानूनी अपील का अधिकार प्रभावी रूप से बेअसर हो गया।

केंद्र ने संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ा बताया आधार

केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट में कहा कि 26 जून 2024 को कैनबरा स्थित भारतीय हाई कमीशन को मिली पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट (PVR) में प्रतिकूल टिप्पणी भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा से जुड़े आधारों पर की गई थी। केंद्र के मुताबिक, पासपोर्ट अधिनियम की धारा 5 के तहत पासपोर्ट प्राधिकरण को आवेदन पर आवश्यक जांच करनी होती है और जांच के निष्कर्षों के आधार पर पासपोर्ट जारी करने से इनकार भी किया जा सकता है।

HC ने दोबारा विचार के लिए भेजा मामला

हाई कोर्ट ने नेगेटिव PVR को महत्वपूर्ण मानते हुए मामले को पासपोर्ट प्राधिकरण के पास नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राधिकरण ने याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिए बिना आवेदन खारिज कर दिया था।अदालत ने कहा कि इस मामले में सुनवाई का मौका देना जरूरी था, क्योंकि आवेदन खारिज करने का मुख्य आधार नेगेटिव PVR ही थी।

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