सुशील सलाम, कांकेर। शिक्षक होने का मतलब सिर्फ स्कूल में बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उनके भविष्य के लिए हर मुश्किल का सामना करना भी है। आज शिक्षक दिवस पर हम आपको कांकेर जिले के दूरस्थ इलाकों में पदस्थ ऐसे ही शिक्षकों की कहानी बताने जा रहे हैं, जो इसी जिम्मेदारी की मिसाल पेश कर रहे हैं। शिक्षा के प्रति इन शिक्षकों का प्रेम और समर्पण देखकर आपका भी दिल पसीज जाएगा।
स्कूल पहुंचने के लिए इन्हें रोज तेज बहाव वाली नदी पार करनी पड़ती है। नाव भी खुद चलानी पड़ती है। नदी के उस पार पहुंचने के बाद जंगल के रास्ते कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इसके बावजूद बच्चों की पढ़ाई न रुके, इसलिए इनका सफर रोज जारी रहता है।

उत्तर बस्तर का कांकेर जिला नदी-नालों, पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा है। जिले के कई अंदरूनी इलाकों में आज भी आवागमन आसान नहीं है। कई जगह नदी पर पुल नहीं हैं और गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है। नक्सलवाद के प्रभाव वाले इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रोजमर्रा का सफर आज भी चुनौती बना हुआ है।
नदी के तेज बहाव में खुद चलाते हैं नाव

ऐसी ही मुश्किल ग्राम संगम के बारकोट इलाके में है। यहां नदी के उस पार बारकोट, हिदुर और खेड़ेगांव बसे हैं। इन गांवों के स्कूल में पदस्थ पांच शिक्षक रोज नाव के सहारे नदी पार करते हैं।
नदी का बहाव तेज हो तो खतरा और बढ़ जाता है। शिक्षकों के पास न लाइफ जैकेट है और न सुरक्षा का कोई दूसरा इंतजाम। नाव को एक किनारे से दूसरे किनारे तक ले जाने के लिए कई बार शिक्षक खुद चप्पू चलाते हैं। जरा सी चूक जानलेवा हो सकती है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी के आगे उनका यह डर भी छोटा पड़ जाता है।
नाव के बाद 6 किमी तक पैदल सफर

नदी पार करने के बाद भी शिक्षकों का सफर खत्म नहीं होता। इसके बाद उन्हें जंगल के रास्तों से पैदल स्कूल तक जाना पड़ता है। किसी को करीब एक किलोमीटर तो किसी को छह किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है।
बारिश के दिनों में रास्ते कीचड़ से भर जाते हैं। फिसलन और खराब रास्तों के बावजूद शिक्षक रोज इसी रास्ते से स्कूल पहुंच रहे हैं। जिले में करीब 32 शिक्षक ऐसे बताए जाते हैं, जो इसी तरह नाव के सहारे नदी-नालों को पार कर अपने स्कूलों तक पहुंचते हैं।
एक बार पलट चुकी है नाव, तैरकर बचाई थी जान

इन शिक्षकों के लिए नदी पार करना रोज का हिस्सा बन चुका है, लेकिन खतरा कभी कम नहीं होता। शिक्षक लोकनाथ कुम्भकार ने बताया कि एक बार नदी के तेज बहाव में नाव पलट गई थी। उन्होंने तैरकर अपनी जान बचाई। इसके बावजूद उन्होंने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। शिक्षक बताते हैं कि डर लगता है, लेकिन बच्चों को शिक्षा देना भी उतना ही जरूरी है। इस इलाके में कुछ शिक्षक 20 साल से अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर बनाई नाव

जिस नाव से शिक्षक नदी पार करते हैं, वह सरकारी व्यवस्था से उपलब्ध नहीं कराई गई है। ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाकर अपने आने-जाने के लिए नाव बनवाई है। अब यही नाव शिक्षकों के लिए भी स्कूल तक पहुंचने का जरिया बनी हुई है।

शिक्षकों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि नदी पर पुल बन जाए तो आवागमन की बड़ी समस्या खत्म हो सकती है। इससे स्कूल जाने वाले शिक्षकों के साथ-साथ ग्रामीणों को भी काफी राहत मिलेगी।
कलेक्टर बोले- शिक्षकों के समर्पण को सलाम

मामले को लेकर कलेक्टर ने भी शिक्षकों के समर्पण की सराहना की है। उनका कहना है कि विषम परिस्थितियों में बच्चों को शिक्षा देने के लिए काम कर रहे शिक्षकों के जज्बे को सलाम है। उन्होंने शिक्षकों और ग्रामीणों की आवागमन संबंधी समस्या दूर करने के लिए प्रयास करने की बात कही है।
मुश्किल रास्तों के बीच जारी है शिक्षा का सफर
कांकेर के इन शिक्षकों की कहानी सिर्फ एक कठिन सफर की कहानी नहीं है। यह उस जिम्मेदारी की तस्वीर है, जिसमें शिक्षक अपनी सुविधा और सुरक्षा से पहले बच्चों के भविष्य को रख रहे हैं।

तेज बहाव वाली नदी, जंगल के रास्ते और बारिश की कीचड़ भरी पगडंडियां रोज इनके सामने चुनौती बनकर खड़ी होती हैं। फिर भी हर सुबह ये शिक्षक नाव की पतवार थामते हैं और स्कूल की ओर निकल पड़ते हैं। शायद यही वह समर्पण है, जो गुरु की भूमिका को सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी बनाता है।
Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H



