Dharm Desk – कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि माना गया है. जिसका महत्व केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत विशेष है. वेदों और पुराणों में वर्णित कुश घास को पवित्रता, ऊर्जा संरक्षण और दिव्यता का प्रतीक बताया है. यही कारण है कि लगभग हर पूजा, यज्ञ, जप और श्राद्ध कर्म में इसका प्रयोग अनिवार्य होता है. कुश से बने आसन पर बैठ कर पूजा करने से साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा पृथ्वी में नष्ट नहीं होती. कुश को विद्युत का कुचालक माना जाता है, जो शरीर में उत्पन्न ऊर्जा को संरक्षित रखने में सहायक होता है. इसी वजह से ऋषि-मुनि और साधक कुशासन का उपयोग करते थे, ताकि उनके तप और मंत्रों की शक्ति अक्षुण्ण बनी रहे.

औषधि के रूप में कुश का महत्व
वेदों में कुश को ऐसी औषधि बताया है, जो तत्काल प्रभाव देने की क्षमता रखती है. मान्यता है कि कुश धारण करने से आयु में वृद्धि होती है. हृदय संबंधी रोगों से रक्षा मिलती है और वातावरण भी शुद्ध रहता है. यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है.
उंगली में पवित्री पहनने का धार्मिक कारण
पूजा-पाठ के दौरान अनामिका उंगली में कुश की अंगूठी, जिसे पवित्री कहा जाता है. धारण की जाती है. यह उंगली सूर्य से संबंधित मानी जाती है, जो जीवन ऊर्जा, तेज और यश का प्रतीक है, कुश की पवित्री पहनने से हाथ में संचित आध्यात्मिक ऊर्जा सुरक्षित रहती है और अन्य उंगलियों में व्यर्थ नहीं जाती.
ऊर्जा संरक्षण का माध्यम है कुश
कुश को ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकने वाला माध्यम माना गया है. कर्म कांड के दौरान हाथ में कुश रखने से यदि हाथ जमीन को छू भी जाए, तो ऊर्जा का क्षय नहीं होता. यह शरीर के मानसिक और शारीरिक संतुलन को बनाए रखने में सहायक कही जाती है.
कुश का जन्म कैसे हुआ
पुराणों के अनुसार, कुश का जन्म भगवान विष्णु के वराह अवतार के शरीर से गिरे रोमों से हुआ था. वहीं एक अन्य मान्यता इसे भगवान शिव के पसीने से कुश उत्पन्न बताती है. दोनों ही कथाएं इसे दैवीय और अत्यंत पवित्र सिद्ध करती हैं.
श्राद्ध कर्म में कुश की अनिवार्यता का कारण
पितृपक्ष में श्राद्ध के दौरान कुश का विशेष महत्व होता है. इसे पितरों से जुड़ने का माध्यम भी बताया गया है. कुश के आसन पर बैठकर तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं. साथ ही यह वातावरण को शुद्ध रखकर कर्म कांड को पूर्ण और प्रभावी बनाता है.

