Odisha Desk, पुरी (श्रीक्षेत्र): ओडिशा के पवित्र धाम श्रीक्षेत्र पुरी में महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी की रथयात्रा हो या स्नानयात्रा, हर एक नीति-नियंत्रण और परंपरा के पीछे एक गूढ़ आध्यात्मिक व सांस्कृतिक कारण छिपा होता है। रथयात्रा के दौरान करोड़ों श्रद्धालु जब भगवान की पहंडी बीजे और गजपति महाराज की ‘छेरा पहरा’ (सोने की झाड़ू से रथ की सफाई) सेवा देखते हैं, तो उनके मन में एक विशेष प्रश्न अवश्य उठता है; पहांडी के समय प्रत्येक विग्रह के साथ एक-एक छत्र (छाता) और आलट होता है, लेकिन गजपति महाराज की तामजान (पालकी) सवारी के दौरान एक से अधिक छत्र और आलट क्यों लाए जाते हैं? आइए जगन्नाथ संस्कृति की इस अलौकिक परंपरा के पीछे के रहस्यों को समझें-

‘चलंती विष्णु’ के रूप में गजपति का दिव्य सम्मान

श्रीमंदिर परंपरा में पुरी के गजपति महाराज केवल एक राजा नहीं, बल्कि महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी के प्रथम सेवक यानी ‘आद्य सेवक’ हैं। उन्हें जगन्नाथ संस्कृति में ‘चलंती विष्णु’ (चलते-फिरते भगवान विष्णु का प्रतीक) मानकर पूजा जाता है।

जब गजपति महाराज श्रीनहर (राजमहल) से तामजान (पालकी) में सवार होकर ‘छेरा पहंरा’ सेवा के लिए निकलते हैं, तब उनके आगे और पीछे:

एक सफेद छत्र और एक काला छत्र

दोनों तरफ २ आलट और २ सफेद चंवर (त्रास)

सुशोभित किए जाते हैं। एक सेवक के लिए इतने सारे राजकीय प्रतीकों का उपयोग उनकी ‘दैवीय मर्यादा’ और जगन्नाथ संस्कृति के सर्वोच्च गार्हस्थ सम्मान को दर्शाता है।

चतुर्धा मूर्ति के लिए व्यक्तिगत ‘देवता सेवा’

दूसरी ओर, जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्रीसुदर्शन जी की पहंडी बीजे होती है, तो प्रत्येक विग्रह के साथ पृथक रूप से सेवा की जाती है।

हर एक विग्रह के पीछे एक ‘मणिमा छत्र’ (काहाली छत्र), एक चंवर और आलट सेवा दी जाती है। चारों विग्रहों को मिलाकर कुल ४ छत्र और आलट प्रयोग होते हैं, लेकिन प्रति देवता यह सेवा केवल एक-एक ही होती है। इसका कारण यह है कि जगन्नाथ दर्शन में प्रत्येक विग्रह स्वयं में संपूर्ण और स्वतंत्र परमब्रह्म हैं, इसलिए उनकी व्यक्तिगत सेवा नीति अत्यंत विशिष्ट और मर्यादित रखी गई है।

“राजाधिराज के चरणों में समर्पित सारा ऐश्वर्य”

गजपति महाराज स्वयं को हमेशा महाप्रभु का एक विनम्र दास मानते हैं। वे जब इस शाही ठाट-बाट के साथ आते हैं, तो यह प्रदर्शन यह संदेश देता है कि संसार का समस्त ऐश्वर्य, शक्ति और राजकीय वैभव केवल और केवल जगत के नाथ श्रीजगन्नाथ जी की आज्ञा व चरणों में समर्पित है।

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