शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्य प्रदेश में महिला एवं बाल विकास विभाग के कामकाज और प्रशासनिक क्षमता को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। विभाग प्रदेश के नौनिहालों और आंगनबाड़ियों की जिम्मेदारी संभालने में पूरी तरह हांफता नजर आ रहा है। अपनी इस नाकामी या व्यवस्थागत लाचारी को छिपाने और बोझ को कम करने के लिए विभाग ने अब एक नया रास्ता निकाला है। प्रदेश की आंगनबाड़ियों को संभालने के लिए कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को आगे लाया जा रहा है। महिला बाल विकास विभाग ने बाकायदा आयुक्त, उच्च शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर इस मामले में सीधी मदद मांगी है।
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मुख्य सचिव कॉन्फ्रेंस की एक्शन रिपोर्ट से खुला ‘सस्पेंस’…
यह पूरा मामला राष्ट्रीय स्तर की एक बैठक और उसकी रिपोर्ट के बाद सतह पर आया है। मुख्य सचिवों की पांचवीं राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दौरान विभाग को आंगनबाड़ियों की हालत सुधारने के कड़े निर्देश मिले थे।
इसी कॉन्फ्रेंस की ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ और बाल अवस्था देखभाल शिक्षा के लक्ष्यों का हवाला देते हुए महिला बाल विकास विभाग ने यह पत्र लिखा है। विभाग का तर्क है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में सामुदायिक स्वामित्व और जनभागीदारी को बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
अब कॉलेज और यूनिवर्सिटीज गोद लेंगी आंगनबाड़ियां!
महिला बाल विकास विभाग के इस सरेंडरनुमा पत्र के बाद उच्च शिक्षा विभाग में भी खलबली मच गई है। पत्र मिलते ही उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त ने तुरंत हरकत में आते हुए प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों और कॉलेजों को पत्र जारी कर दिया है।
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इस नए आदेश के बाद अब मध्य प्रदेश के सभी सरकारी-निजी विश्वविद्यालय और कॉलेज अपने-अपने क्षेत्रों की आंगनबाड़ियों को गोद ले सकेंगे और उनकी पूरी जिम्मेदारी संभालेंगे।


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