शादी के बाद महिला द्वारा अपने नाम के साथ पति का सरनेम जोड़ना एक आम सामाजिक परंपरा है, लेकिन दिल्ली की एक महिला के लिए यही बदलाव बड़ी कानूनी परेशानी बन गया। मामले के अनुसार, बीमा कंपनी ने केवल नाम में अंतर का हवाला देते हुए महिला की मैच्योर हुई जीवन बीमा पॉलिसी (Life Insurance Policy) की लाखों रुपये की राशि रोक दी। कंपनी का कहना था कि दस्तावेजों में नाम अलग होने के कारण दावे की पुष्टि नहीं हो पा रही है। इस फैसले के बाद महिला को अपने हक की राशि पाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अंततः अदालत ने मामले में महिला के पक्ष में फैसला सुनाया और बीमा राशि जारी करने का आदेश दिया।

उत्तर-पूर्वी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक महत्वपूर्ण मामले में बीमा कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने बीमा कंपनी को ब्याज सहित पूरी बीमा राशि लौटाने का आदेश दिया है। आयोग के अध्यक्ष सुरिंदर कुमार शर्मा और सदस्य आदर्श नैन की बेंच ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी या दस्तावेजी कारणों का हवाला देकर किसी उपभोक्ता के वैध दावे को रोका नहीं जा सकता। मामला उस समय सामने आया जब बीमा कंपनी ने नाम में अंतर को आधार बनाकर एक महिला की मैच्योर जीवन बीमा पॉलिसी की राशि रोक दी थी। हालांकि आयोग ने माना कि शादी के बाद नाम में बदलाव एक सामान्य प्रक्रिया है और इसे दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

महिला ने 2012 में खरीदी थी बीमा पॉलिसी

दिल्ली के यमुना विहार निवासी प्रीति विंडलेश से जुड़ा एक अहम बीमा विवाद सामने आया है, जिसमें नाम में बदलाव के कारण उनकी मैच्योर जीवन बीमा राशि रोकी गई थी। जानकारी के अनुसार, प्रीति ने 24 दिसंबर 2012 को ING Life Insurance से एक जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। बाद में यह कंपनी Exide Life Insurance और फिर HDFC Life Insurance में मर्ज हो गई। दिसंबर 2023 में पॉलिसी मैच्योर होने पर कंपनी ने उनके नाम 5,12,069 रुपये का चेक जारी किया, लेकिन यह चेक उनके पुराने नाम “प्रीति” पर जारी हुआ। जबकि शादी के बाद उन्होंने अपने नाम में पति का सरनेम जोड़कर “प्रीति विंडलेश” कर लिया था और अन्य सभी दस्तावेजों में भी यही नाम अपडेट करवा लिया था।

नाम में अंतर के आधार पर रिजेक्ट गया था चेक

मामला उस समय सामने आया जब बीमा कंपनी द्वारा जारी किया गया चेक बैंक में नाम में अंतर के कारण अस्वीकार कर दिया गया। जानकारी के अनुसार, महिला ने यह चेक अपने Kotak Mahindra Bank खाते में जमा किया था, लेकिन पुराने और नए नाम में अंतर होने के कारण बैंक ने भुगतान प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया। इसके बाद महिला ने उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई।

आयोग का फैसला

उत्तर-पूर्वी जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सुनवाई के बाद बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह 5.12 लाख रुपये की बीमा राशि शिकायत दायर करने की तारीख से भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज सहित 45 हजार रुपये मानसिक उत्पीड़न के लिए 20 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में अदा करे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल नाम में बदलाव या तकनीकी कारणों के आधार पर किसी वैध उपभोक्ता दावे को रोका नहीं जा सकता।

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