Supreme Court New Guidelines For Judges: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों में एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के हवाले से देशभर के जजों के लिए अपनी नई गाइडलाइंस जारी की हैं. इस नई गाइडलाइंस के अनुसार रेप और यौन अपराधों के मामलों में जजों और जजमेंट की भाषा को लेकर निर्देश दिए गए है. रिपोर्ट में “बेबस महिला”, “पवित्रता खो दी” या “मर्यादा भंग की” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद करने के लिए कहा गया है. कोर्ट की ओर से जारी किए गए ये सुझाव सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अगुवाई वाली एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हिस्सा हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट का नाम “Judgments and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments” है. इसमें जजों के लिए बताया गया है कि वह किन शब्दों के इस्तेमाल से बचें और उन शब्दों की भी सिफारिश है, जिसके इस्तेमाल की अपेक्षा की जाती है.

रिपोर्ट में ऐसे शब्दों की सूची दी गई है, जिनका जज अक्सर प्रयोग करते हैं. उनके स्थान पर कानूनी रूप से उपयुक्त विकल्प भी सुझाया गया है. जैसे-‘महिला का शरीर खेल का मैदान’ कहने की जगह “शिकायतकर्ता की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन”, अपनी पवित्रता/शील खो दी की जगह ‘सरवाइवर की शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ’, लज्जा भंग’ के बजाय ‘यौन उत्पीड़न’, जैसे शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए. रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि अदालतों को “बेचारी असहाय नाबालिग लड़की”, “वासना से प्रेरित”, “अपनी वासना पूरी करने के लिए” जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. 

यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अगुवाई वाले पैनल ने देशभर के 125 ट्रायल कोर्ट के जजमेंट के विश्लेषण के आधार पर तैयार की है.

अगर बात नटशेल में कहा जाए तो समिति ने न्यायपालिका में रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों में एक नया लैंग्वेज इकोसिस्टम बनाने की पैरवी की है, जो जजों से आग्रह किया गया है कि वादी महिला के लिए रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों में परंपरागत सोच और कलंक के भाव वाली शब्दावली के इस्तेमाल से बचें.

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