Odisha Desk, पुरी: विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘नीलाद्रि बीजे’ माना जाता है। इस पावन अवसर पर महाप्रभु श्री जगन्नाथ, अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ दिनों की गुंडिचा यात्रा समाप्त कर पुनः अपने मुख्य मंदिर यानी श्रीमंदिर लौटते हैं। लेकिन श्रीमंदिर के मुख्य द्वार पर महाप्रभु का स्वागत सीधे नहीं होता, बल्कि यहां एक बहुत ही सुंदर और मानवीय लीला देखने को मिलती है।
क्यों नाराज होती हैं देवी महालक्ष्मी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब महाप्रभु श्री जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान नौ दिनों के लिए अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं, तो वे अपनी अर्धांगिनी देवी महालक्ष्मी को अपने साथ नहीं ले जाते। इस बात से देवी महालक्ष्मी अत्यंत क्रोधित और अभिमान में आ जाती हैं।
जब नीलाद्रि बीजे के दिन भगवान जगन्नाथ वापस श्रीमंदिर पहुंचते हैं, तो देवी लक्ष्मी उनके लिए मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर देती हैं और उन्हें अंदर प्रवेश करने से रोक देती हैं।
‘मान भंजन’ और रसगुल्ले की मिठास
संसार के स्वामी होने के बावजूद, भगवान श्री जगन्नाथ अपनी पत्नी के इस रूठने (मान) को शांत करने के लिए एक बेहद मधुर रास्ता अपनाते हैं। इस पवित्र अनुष्ठान को ‘मान भंजन’ कहा जाता है।
रसगुल्ले का भोग: महाप्रभु श्री जगन्नाथ देवी महालक्ष्मी का गुस्सा शांत करने के लिए उन्हें रसीला और स्वादिष्ट रसगुल्ला भेंट करते हैं।
श्रीमंदिर में प्रवेश: रसगुल्ले का भोग स्वीकार करने के बाद देवी महालक्ष्मी का क्रोध शांत होता है, और वे मंदिर के द्वार खोल देती हैं। इसके बाद ही महाप्रभु मंदिर के अंदर प्रवेश कर रत्नवेदी पर विराजमान होते हैं।
ओडिशा में धूमधाम से मनाया जाता है ‘रसगुल्ला दिवस’
जगन्नाथ संस्कृति में रसगुल्ले का यह महत्व सदियों पुराना है। यही कारण है कि नीलाद्रि बीजे के इस पावन पर्व को पूरा ओडिशा ‘रसगुल्ला दिवस’ (Rasagola Dibasa) के रूप में बड़े उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाता है। यह परंपरा सिखाती है कि भक्ति और प्रेम में मान-मनुव्वल और मिठास का कितना बड़ा स्थान है।
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