मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की हकीकत सामने आई है। एक तरफ जहां करोड़ों खर्च कर एंबुलेंस सुविधा देने की बात कही जाती है, दूसरी तरफ प्रदेश के 2 जिलों में बड़ी लापरवाही देखने को मिली। सतना में जहां स्ट्रेचर न होने पर ड्राइवर ने मरीज को ऑटो में बिठाकर वार्ड तक पहुंचाया। वहीं सिंगरौली में 8 साल के मासूम की मौत के बाद शव वाहन नसीब नहीं हुआ जिसके बाद परिजन बाइक पर शव लेकर घर पहुंचे।  

सतना जिला अस्पताल में स्ट्रेचर संकट

अनमोल मिश्रा, सतना।जिला अस्पताल में आज एक इलेक्ट्रिक ऑटो के हड्डी वार्ड के सामने तक पहुंचने से कुछ देर के लिए हड़कंप मच गया। सुरक्षा गार्डों ने ऑटो चालक को पकड़कर पुलिस चौकी के हवाले कर दिया, लेकिन जब पूरी कहानी सामने आई तो यह मामला सुरक्षा चूक से ज्यादा अस्पताल की बदहाल व्यवस्था और एक ऑटो चालक की इंसानियत की मिसाल बनकर सामने आया। 

ऑटो में सवार मरीज संतोष अग्रवाल ने बताया कि सड़क दुर्घटना में उनका पैर टूट गया है और उनका ऑपरेशन होना है। फिलहाल खून की कमी के कारण उन्हें वार्ड क्रमांक-4 में भर्ती किया जाना था। मरीज के मुताबिक वह अस्पताल में अकेले थे और मेन गेट पर उन्हें वार्ड तक ले जाने के लिए न तो स्ट्रेचर मिला और न ही कोई सहयोगी। ऐसे में उन्होंने ऑटो चालक से वार्ड तक छोड़ने की गुजारिश की। मरीज की परेशानी को देखते हुए चालक ने मानवता दिखाते हुए ऑटो सीधे वार्ड के गेट तक पहुंचा दिया। हालांकि अस्पताल के अंदर ऑटो पहुंचते ही सुरक्षा गार्ड सक्रिय हुए और चालक को पकड़कर पुलिस चौकी ले गए जहां उससे पूछताछ की गई। 

यह घटना जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करती है। अगर प्रवेश द्वार पर मरीजों के लिए समय पर स्ट्रेचर और सहायक कर्मचारी उपलब्ध होते तो शायद ऑटो चालक को ऐसा कदम उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। गंभीर मरीज को तत्काल इलाज दिलाने की कोशिश में चालक ने नियमों का उल्लंघन जरूर किया लेकिन उसका उद्देश्य केवल मरीज की मदद करना था। 

यह पहली बार नहीं है जब अस्पताल की अव्यवस्था के कारण किसी वाहन को वार्ड तक ले जाना पड़ा हो। इससे पहले 30 मई को भी स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं होने पर एक युवक अपने मरीज को लेने बाइक से फर्स्ट फ्लोर स्थित वार्ड तक पहुंच गया था। उस समय मरीज को रीवा रेफर किया जाना था और तत्काल स्थिति को देखते हुए परिजन को केवल समझाइश देकर जाने दिया गया था। 

दोनों घटनाएं यह बताती हैं कि समस्या केवल सुरक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि मरीजों के लिए मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता की भी है। जब जरूरतमंद मरीज को समय पर स्ट्रेचर नहीं मिलता, तब परिजन और मददगार लोग मजबूरी में ऐसे कदम उठाते हैं। ऐसे में नियमों के पालन के साथ-साथ अस्पताल प्रबंधन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी मरीज को इलाज तक पहुंचने के लिए इस तरह की मजबूरी का सामना न करना पड़े।  

सिंगरौली में शव वाहन का अकाल! 

सुरेश पांडेय, सिंगरौली। सिंगरौली के चितरंगी अस्पताल से इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। सर्पदंश से 8 वर्षीय मासूम की मौत के बाद अस्पताल में शव वाहन तक उपलब्ध नहीं था। मजबूर परिजन मासूम का शव मोटरसाइकिल पर रखकर घर ले गए। सवाल ये है कि क्या सरकारी अस्पतालों में मौत के बाद भी सम्मान नसीब नहीं होगा।
सिंगरौली जिले के चितरंगी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां एक बार फिर सामने आई हैं। ग्राम हरफरी निवासी बाबूलाल सिंह अपने 8 वर्षीय बेटे को शनिवार सुबह सर्पदंश के बाद इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टरों के प्रयास के बावजूद दोपहर करीब 2 बजे मासूम की मौत हो गई।

लेकिन असली दर्द तब शुरू हुआ, जब अस्पताल में शव वाहन उपलब्ध नहीं मिला। परिजन घंटों इंतजार करते रहे, लेकिन कोई व्यवस्था नहीं हुई। आखिरकार मजबूरी में मासूम के शव को मोटरसाइकिल पर रखकर गांव ले जाना पड़ा। यह दृश्य देखकर अस्पताल में मौजूद लोग भी भावुक हो उठे और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करने लगे।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में शव वाहन जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव लंबे समय से बना हुआ है। उनका कहना है कि अगर समय पर शव वाहन उपलब्ध होता तो परिजनों को इस दर्दनाक और अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

अब इस घटना के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद क्या एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में शव वाहन जैसी मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो सकती।

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