दुर्गेश राजपूत, नर्मदापुरम। इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष और जंगलों में अनाथ हुए वन्यजीवों को नया जीवन देने में नर्मदापुरम का सतपुड़ा टाइगर रिजर्व मिसाल पेश कर रहा है। एसटीआर के चूरना और मालिनी रेंज में बने दो विशेष रिवाइल्डिंग सेंटर्स (बाड़े) पिछले 10 सालों से अनाथ, उत्पत्ति (उग्र स्वभाव वाले), शरारती और मानवीय बस्तियों में आतंक मचाने वाले बाघों (टाइगर्स) और तेंदुओं (लेपर्ड्स) के लिए सुधार गृह साबित हो रहे हैं। अब तक इन सेंटर्स के माध्यम से 25 बाघों और 3 तेंदुओं को सुधार कर वापस प्राकृतिक आवास यानी खुले जंगल में सुरक्षित छोड़ा जा चुका है।
एसटीआर की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने बताया कि मध्य प्रदेश वन विभाग की ओर से प्रदेश के कुछ ही टाइगर रिजर्व में यह अनूठी व्यवस्था की गई है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के चूरना रेंज में साल 2017 में पहला रिवाइल्डिंग सेंटर (बाड़ा) बनाया गया था, जिसकी सफलता को देखते हुए दो-तीन साल बाद मालिनी रेंज में दूसरा सेंटर तैयार किया गया। जब भी प्रदेश में कहीं कोई बाघ या तेंदुआ इंसानी इलाकों में घुस जाता है या अनाथ हो जाता है, तो रेस्क्यू टीम उसे इन सेंटर्स में लाती है। जहां उन्हें पूरी तरह प्राकृतिक माहौल में रखकर शिकार करना सिखाया जाता है। इसके लिए उन्हें जिंदा मुर्गी, बकरे, हिरण और सांभर-चीतल का शिकार दिया जाता है।
इन बाड़ों में वन्यजीवों की 24 घंटे कड़ी निगरानी की जाती है। फील्ड डायरेक्टर के अनुसार, स्थानीय स्तर पर दो चौकीदारों सहित करीब 5 से 6 लोगों का विशेष स्टाफ इनकी मॉनिटरिंग करता है। इसके अलावा वाइल्डलाइफ ऑफिसर समय-समय पर वन्यजीवों का फिजिकल चेकअप करते हैं। बीमार होने पर उन्हें उचित मेडिकल ट्रीटमेंट दिया जाता है और गंभीर स्थिति होने पर ही बाहर भेजा जाता है। हाल के वर्षों में जहां अब्दुल्लागंज से दो बाघ, बांधवगढ़, बालाघाट और पेंच टाइगर रिजर्व से दो शावक (शावक) लाए जा चुके हैं, जिन्हें सफलतापूर्वक रिवाइल्ड किया गया।
प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य इन हिंसक या भटके हुए जीवों को वापस एक मुक्त और प्राकृतिक जीवन देना है। जब यह जीव पूरी तरह आत्मनिर्भर और इंसानी बस्तियों से दूर रहने लायक हो जाते हैं, तो इन्हें खुले जंगल में छोड़ दिया जाता है। जंगल में छोड़े जाने के बाद भी इनकी रेडियो कॉलर या अन्य माध्यमों से निगरानी जारी रहती है। हालांकि, यदि लंबे प्रयासों के बाद भी किसी बाघ या तेंदुए के व्यवहार में कोई सुधार नहीं होता और उसका हिंसक रवैया बरकरार रहता है, तो उसे अंतिम विकल्प के रूप में भोपाल के ‘वन विहार’ राष्ट्रीय उद्यान भेज दिया जाता है।
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