देश की राजधानी की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की छवि को लेकर चौंकाने वाला खुलासा। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मिले आंकड़ों में सामने आया है कि 80 हजार से अधिक जवानों वाले दिल्ली पुलिस बल में हर 100 में से करीब 1 पुलिसकर्मी आपराधिक मामलों (criminal cases) में आरोपी है। आंकड़ों के मुताबिक, बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के खिलाफ अलग-अलग आपराधिक मामलों में शिकायतें और मुकदमे दर्ज हैं। दिल्ली पुलिस देश की सबसे हाईटेक सुरक्षा एजेंसियों में शामिल है और राजधानी की कानून-व्यवस्था, VVIP सुरक्षा और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी संभालती है। ऐसे में पुलिसकर्मियों पर दर्ज आपराधिक मामलों ने विभाग की साख पर असर डाला है।
RTI से सामने आई जानकारी
यह जानकारी वकील गौरव भारद्वाज द्वारा 28 अप्रैल को दायर की गई RTI के जवाब में सामने आई है। वर्ष 2020 से अब तक दुष्कर्म सहित अन्य आपराधिक मामलों में आरोपी बनाए गए पुलिसकर्मियों का ब्योरा मांगा गया था। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली पुलिस की उस विंग में, जो कैदियों को अदालतों तक ले जाने का काम करती है, दुष्कर्म के आरोपों का सामना कर रहे 14 जवान तैनात हैं। इसके अलावा इसी यूनिट में 136 ऐसे पुलिसकर्मी भी तैनात हैं, जिनके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मामलों में मुकदमे दर्ज हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2020 से मई 2026 तक दिल्ली पुलिस के 925 कर्मियों के खिलाफ मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 52 पुलिसकर्मी दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, अभी तक किसी भी मामले में किसी पुलिसकर्मी को सजा मिलने की जानकारी सामने नहीं आई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले साढ़े 5 सालों में इन 925 आरोपी पुलिसकर्मियों में से किसी भी जवान को अदालत से सजा नहीं मिली है।
स्वतंत्र एजेंसियों से जांच और समयबद्ध ट्रायल जरूरी‘
विशेषज्ञों का कहना है कि जब गंभीर अपराधों के आरोप पुलिसकर्मियों पर लगते हैं तो जांच प्रक्रिया की गति और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मामलों में स्वतंत्र एजेंसियों से जांच कराई जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे। इसके साथ ही समयबद्ध तरीके से ट्रायल पूरा होना भी जरूरी है, जिससे दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो सके और पीड़ितों को जल्द न्याय मिल सके। RTI आवेदक और वकील गौरव भारद्वाज ने कहा, “दुष्कर्म जैसे मामलों में कानून के तहत समयबद्ध तरीके से ट्रायल पूरा किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ितों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। हालांकि, जब खाकी पर आरोप लगते हैं, तब जांच की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। इससे न केवल न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि पुलिस की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।”
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