बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के दो पदाधिकारियों को इलाके से बाहर करने के मुंबई पुलिस के आदेशों को रद्द कर दिया. हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस की इस बात के लिए भी आलोचना की कि दूसरे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भी उन्हीं प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, पर सिर्फ़ दो याचिकाकर्ताओं को ही पुलिस ने निशाना बनाया. चुनिंदा तरीके से कार्रवाई नहीं की जा सकती.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि यह राय रखना कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था. यह देश विरोधी नहीं है. इसे एंटी-नेशनल भी नहीं माना जा सकता.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने SDPI के दो नेताओं के खिलाफ मुंबई पुलिस के तड़ीपार के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि सिर्फ ऐसा कहना कि बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, राष्ट्रविरोधी नहीं है. हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी है और उसके अंतर्गत किसी नागरिक को इस मुद्दे पर ऐसी राय रखने का बिल्कुल अधिकार है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जज जस्टिस माधव जामदार ने टिप्पणी की प्राथमिकी सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ है. लेकिन केवल इन याचिकाकर्ताओं को निशाना बनाया गया. अदालत ने फ़िरोज़ अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफ़ीक गुलाम रसूल अंसारी को तड़ीपार करने के उस आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें मुंबई पुलिस ने इन दोनों को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने का निर्देश दिया था.
जस्टिस जामदार ने कहा कि एफआईआर तो सभी लोगों के खिलाफ हुई है, पर पुलिस ने कांग्रेस और UBT गुट के लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की. याचिकाकर्ता फिरोज खान और मोहम्मद रफीक अंसारी ने पुलिस के 3 दिसंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मुंबई पुलिस के तड़ीपार के आदेश दिया था.
राज्य की ओर से पेश हुए मुख्य सरकारी वकील शिशिर हिरे ने आरोप लगाया कि आरोपियों के संबंध ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया’ (PFI) से थे. हालांकि कोर्ट ने PFI से कथित संबंधों वाली बात को मानने से इनकार कर दिया.
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