सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दिल्ली में अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और निर्माण कार्यों को अस्थायी सुरक्षा देने वाले कानूनों की समय-सीमा बार-बार बढ़ाए जाने पर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसी व्यवस्था ने दिल्ली के प्रशासन में “अस्थायी प्रबंधन” की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिसका असर यमुना नदी (Yamuna River) के किनारों से अतिक्रमण हटाने जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं पर पड़ सकता है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत यमुना नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए एक व्यापक यमुना एक्शन प्लान (YAP) तैयार करने से संबंधित मामले पर विचार कर रही थी। अदालत ने संकेत दिया कि अनधिकृत बस्तियों और अतिक्रमणों को लगातार राहत देने से दीर्घकालिक शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास प्रभावित होते हैं।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच यमुना नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने ‘नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉज (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 2006’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून के तहत लगातार दी जा रही सुरक्षा के कारण शहरी नियोजन और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास प्रभावित हो रहे हैं। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, “देखिए, इस शहर का कामकाज कितने कामचलाऊ तरीके से चल रहा है। दिल्ली के लिए एक मास्टर प्लान है, लेकिन उसे 20 साल से लागू ही नहीं होने दिया गया है।” अदालत ने संकेत दिया कि जब अस्थायी उपायों को लगातार विस्तार दिया जाता है, तो स्थायी समाधान लागू करना कठिन हो जाता है। इससे शहरी विकास, पर्यावरण संरक्षण और भूमि प्रबंधन जैसी योजनाएं प्रभावित होती हैं।

2006 का कानून क्या है?

सुप्रीम कोर्ट जिस कानून का उल्लेख कर रहा था, वह नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉज (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 2006 है। यह कानून अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और अनधिकृत निर्माणों को सीलिंग, तोड़-फोड़ और अन्य दंडात्मक कार्रवाई से अस्थायी सुरक्षा प्रदान करता है। मूल रूप से इसे एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर लाया गया था, ताकि इन क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक समाधान तैयार किया जा सके। हालांकि, समय-समय पर इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही है। वर्ष 2023 में इसे फिर बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 तक लागू रखा गया। बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 2006 का यह कानून लगभग हर तरह के अनधिकृत निर्माण और बस्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है। अदालत ने कहा कि यदि यमुना एक्शन प्लान तैयार भी कर लिया जाए, लेकिन उसे लागू ही न किया जा सके, तो पूरी कवायद का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

इस तरह शहर का कामकाज नहीं चल सकता”

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि दिल्ली मास्टर प्लान 2047 को अंतिम रूप दे दिया गया है। इस पर बेंच ने कहा कि केवल नया मास्टर प्लान तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “आप इस तरह किसी शहर का कामकाज नहीं चला सकते। 20 साल से दिल्ली में मास्टर प्लान लागू नहीं होने दिया गया है।” बेंच ने संकेत दिया कि लंबे समय तक अस्थायी राहत और कानूनी संरक्षण की व्यवस्था बनाए रखने से शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण की योजनाएं प्रभावित होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2006 का विशेष प्रावधान कानून अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों और अवैध निर्माणों को सीलिंग तथा ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाइयों से सुरक्षा प्रदान करता है। मूल रूप से अस्थायी समाधान के तौर पर लाया गया यह कानून कई बार बढ़ाया जा चुका है और फिलहाल इसकी अवधि 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ाई गई है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर के लिए निर्धारित करते हुए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली समिति को यमुना एक्शन प्लान का अंतिम मसौदा दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया। सुनवाई के दौरान अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता (एमिकस क्यूरी) के. परमेश्वर ने बताया कि नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉज (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 2006 मूल रूप से एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में लाया गया था, लेकिन इसकी अवधि कई बार बढ़ाई जा चुकी है। उन्होंने कहा कि यमुना एक्शन प्लान के क्रियान्वयन पर इस कानून के प्रभाव और उससे जुड़ी कानूनी चुनौतियों का अध्ययन किया जा रहा है। अदालत ने भी माना कि बार-बार विस्तार दिए जाने से यह कानून अब दीर्घकालिक योजनाओं के रास्ते में बड़ी चुनौती बन गया है।

सुनवाई के दौरान बेंच ने टिप्पणी की कि राजनीतिक प्रशासन किसी भी ऐसी योजना को लागू नहीं होने देगा, जिसमें अतिक्रमण हटाने या अनधिकृत निर्माणों पर कार्रवाई की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि वर्षों से जारी अस्थायी सुरक्षा के कारण प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर ऐसी स्थिति बन गई है, जहां पर्यावरण संरक्षण और शहरी नियोजन से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करना कठिन हो गया है।

जस्टिस मनमोहन ने साझा किया अनुभव

बेंच में शामिल जस्टिस मनमोहन ने दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल का एक अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि निजामुद्दीन वेस्ट क्षेत्र में एक बस्ती विकसित हो गई थी, जिसके कारण यमुना नदी का प्राकृतिक जल प्रवाह बाधित हो गया था। उन्होंने कहा कि मानसून के दौरान इस बाधा के कारण नदी का पानी वापस लौटने लगा और महारानी बाग जैसे इलाकों में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई। जब उस बस्ती को हटाने की कोशिश की गई, तब राजनीतिक प्रशासन ने 2006 के कानून का हवाला देकर कार्रवाई रोक दी। जस्टिस मनमोहन ने कहा कि इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं जो कुछ मामलों में कानूनी रोक का आधार बन जाते हैं और इसी वजह से अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती।

अदालत ने कहा कि नदी के तल पर अतिक्रमण, अवैध उद्योगों से जहरीले कचरे का बहाव, अनधिकृत कॉलोनियों से बिना उपचारित सीवेज और बारिश के पानी की नालियों में सीवेज मिलने जैसी समस्याओं ने यमुना को “सीवेज नाले जैसा” बना दिया है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि दिल्ली का मास्टर प्लान आम तौर पर करीब 20 साल की अवधि को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। अदालत ने इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि 2006 के विशेष प्रावधान कानून की वजह से लंबे समय तक मास्टर प्लान को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका।

नदी के संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने 21 मई के अपने आदेश का भी उल्लेख किया। इसमें यमुना के नदी तल पर कब्जे, खासकर दिल्ली के संवेदनशील ‘जोन O’ में अतिक्रमण को बड़ी समस्या बताया गया था। अदालत के मुताबिक, इसके अलावा अवैध उद्योगों से जहरीले अपशिष्ट का नदी में जाना, अनधिकृत कॉलोनियों से बिना साफ किया गया सीवेज निकलना और वर्षा जल निकासी व्यवस्था में सीवेज का मिलना यमुना के प्रदूषण को लगातार बढ़ा रहा है। कोर्ट ने कहा कि इन सभी कारणों ने मिलकर नदी की स्थिति को बेहद खराब कर दिया है और यमुना को लगभग सीवेज नाले में बदल दिया है।

कड़े फैसले लेने की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने यमुना के संरक्षण के लिए केवल अलग-अलग विभागों की कार्रवाई के बजाय समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि विभिन्न एजेंसियां अक्सर अलग-अलग दिशाओं में या एक-दूसरे के विपरीत काम करती हैं। इससे प्रदूषण कम होने के बजाय कई बार समस्या और बढ़ जाती है। अदालत ने माना कि यमुना को बचाने के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। अतिक्रमण हटाने, अवैध उद्योगों को बंद करने और अनधिकृत कॉलोनियों के पुनर्वास जैसे कठिन फैसले लेने होंगे।

सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जोड़ने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यमुना एक्शन प्लान तैयार करने वाली समिति को निर्देश दिया कि इसमें उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को शामिल किया जाए, जिनसे होकर यमुना नदी गुजरती है। इसके साथ ही संबंधित राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रमुखों और मामले में अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी को भी प्रक्रिया में शामिल करने को कहा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यमुना जैसी नदी के संरक्षण की जिम्मेदारी किसी एक एजेंसी या एक राज्य तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच प्रभावी समन्वय जरूरी है।

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