लखनऊ. गो संरक्षण को अब सिर्फ गोशालाओं की जिम्मेदारी न मानकर नई पीढ़ी की भागीदारी से गांव-गांव का अभियान बनाने की तैयारी है. योगी सरकार जेन-जी को गो संरक्षण से जोड़ने के लिए प्रदेश में करीब 10 हजार ‘गो मित्र’ तैयार करेगी. ये गो मित्र बच्चों और युवाओं को गो सेवा, देसी गोवंश, प्राकृतिक खेती और गो आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में जागरुक करेंगे. इस पहल की खास बात यह होगी कि पहले चुनिंदा लोगों को मास्टर ट्रेनर बनाया जाएगा. इसके बाद यही मास्टर ट्रेनर गांव-गांव अन्य लोगों को प्रशिक्षण देंगे. गो संरक्षण और गो सेवा में पहले से रुचि रखने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी.
जेन-जी अब गो सेवा से जुड़ेगी
गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के मुताबिक सरकार का जोर नई पीढ़ी को केवल भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि गो संरक्षण के पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व से जोड़ने पर है. गांवों में अभियान चलाकर बच्चों और युवाओं को बताया जाएगा कि गोवंश प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, ऊर्जा और ग्रामीण रोजगार में किस तरह उपयोगी हो सकता है.
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10 हजार गो मित्र बनाएंगे गांवों में नेटवर्क
इस अभियान के तहत प्रशिक्षित गो मित्र गांवों में लोगों तक पहुंचेंगे. वे गो संरक्षण, गो सेवा और गो आधारित रोजगार के अवसरों की जानकारी देंगे. प्रशिक्षण व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा, ताकि एक मास्टर ट्रेनर के जरिए कई नए प्रशिक्षक तैयार किए जा सकें. सरकार की कोशिश है कि इसका नेटवर्क केवल शहरों या सरकारी संस्थानों तक सीमित न रहे, बल्कि गांव स्तर तक प्रशिक्षित लोगों की टीम खड़ी हो.
7,500 से ज्यादा गो आश्रय स्थल
प्रदेश में निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए 7,500 से अधिक गो आश्रय स्थल संचालित किए जा रहे हैं. इनमें 12 लाख से अधिक गोवंश संरक्षित होने का दावा किया गया है. सरकार ने गोवंश के भरण-पोषण के लिए मिलने वाली सहायता राशि भी बढ़ाई है. प्रति गोवंश प्रतिदिन मिलने वाली राशि 30 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये की गई है. अधिकांश गो आश्रय स्थलों पर सीसीटीवी के जरिए निगरानी की व्यवस्था भी की गई है.
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गोशाला से घर तक पहुंचा गोवंश
सरकार लोगों को सीधे गोवंश संरक्षण से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री सहभागिता योजना और पोषण मिशन भी चला रही है. इसके तहत करीब 1.15 लाख पशुपालकों को 1.85 लाख गोवंश सौंपे जाने की जानकारी दी गई है. इस मॉडल के जरिए सरकार का प्रयास है कि गोवंश को सिर्फ संस्थागत आश्रय न मिले, बल्कि परिवार और पशुपालक भी संरक्षण की व्यवस्था से जुड़ें.
गोबर अब कचरा नहीं
सरकार की नजर गो संरक्षण के साथ-साथ गो आधारित अर्थव्यवस्था पर भी है. गोशालाओं में गोबर से गो-काष्ठ, गो-पेंट, वर्मीकम्पोस्ट, धूपबत्ती, अगरबत्ती, गमले और दीपक जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. इसके अलावा पंचगव्य, घनामृत और जीवामृत जैसे उत्पादों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. महिला स्वयं सहायता समूहों को इन गतिविधियों से जोड़कर गांवों में रोजगार के अवसर पैदा करने की कोशिश है.
हर जिले में अलग मॉडल
गो सेवा आयोग अब प्रदेश की गोशालाओं की क्षमता का व्यापक मूल्यांकन भी करेगा. जिस जिले में बायोगैस की संभावना अधिक होगी, वहां ऊर्जा आधारित गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा. वहीं दूसरे जिलों में जैविक खाद, गो-काष्ठ या गोमूत्र आधारित उत्पादों की इकाइयां विकसित की जा सकती हैं.


