पूर्वांचल की राजनीति में कई दशक तक सक्रिय रहे बाहुबली पूर्व विधायक विजय मिश्रा को लेकर हाल के दिनों में एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है कि उन्हें उनकी जाति विशेष के कारण निशाना बनाया जा रहा है. जबकि न्यायालयों के फैसले, जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और दशकों से दर्ज आपराधिक मुकदमे इस दावे की सच्चाई को पूरी तरह खारिज करते हैं. वास्तविकता यह है कि विजय मिश्रा कोई ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का शिकार नहीं, बल्कि कानून द्वारा दोषी ठहराया गया एक सफेदपोश माफिया है, जिसने राजनीतिक ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल कर वर्षों तक अपराध का समानांतर तंत्र खड़ा किया.

आज कुछ लोग विजय मिश्रा पर हुई कार्रवाई को ‘ब्राह्मण उत्पीड़न’ का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन तथ्य यह है कि उसके खिलाफ कार्रवाई अदालतों के फैसलों और जांच एजेंसियों के सबूतों के आधार पर हुई है. उसके खिलाफ दर्ज मामलों में पीड़ितों में बड़ी संख्या ब्राह्मण समाज के लोगों की ही रही है. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि अपराध और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में जाति, धर्म, मत, मजहब या राजनीतिक पहचान नहीं देखी जाएगी. राज्य में माफिया और संगठित अपराध के खिलाफ चलाए गए अभियानों में विभिन्न जातियों और समुदायों से जुड़े अपराधियों पर समान रूप से कार्रवाई हुई है. विजय मिश्रा का मामला भी इसी नीति का हिस्सा है, जहां दशकों से लंबित मामलों में अदालतों के जरिए सजा सुनिश्चित हुई.

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प्रकाश नारायण पांडे (हत्याकांड – 1980)

विजय मिश्रा के खिलाफ सबसे गंभीर मामलों में से एक 11 फरवरी 1980 को प्रयागराज जिला अदालत परिसर में हुई प्रकाश नारायण पांडे की हत्या थी. प्रकाश नारायण पांडे एक विश्वविद्यालय के छात्र थे जो एक मामले में जमानत लेने अदालत आए थे. इस मामले में विजय मिश्रा को मई 2026 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है. इस केस की प्राथमिकी (FIR) मृतक के बड़े भाई श्याम नारायण ने दर्ज कराई थी. हाल ही में प्रयागराज की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने विजय मिश्रा को 46 साल पुराने इस हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है.

कृष्ण मोहन तिवारी उर्फ ‘मुन्ना’ (संपत्ति कब्जा – 2020)

विजय मिश्रा के पतन की शुरुआत उसके अपने ही एक रिश्तेदार कृष्ण मोहन तिवारी की शिकायत से हुई. अगस्त 2020 में, कृष्ण मोहन तिवारी ने आरोप लगाया कि मिश्रा और उसके परिवार ने उनकी पैतृक संपत्ति (लगभग 50 बीघा जमीन और एक बड़ा घर) पर जबरन कब्जा कर लिया है और उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. इस मामले में मई 2026 में विजय मिश्रा, उसकी पत्नी और बेटे को 10-10 साल की, जबकि बहु को 4 साल जेल की सजा सुनाई गई है.

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विपुल दुबे (राजनीतिक अदावत – 2022)

विजय मिश्रा की राजनीतिक पकड़ कमजोर करने में विपुल दुबे का नाम महत्वपूर्ण है. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में, निषाद पार्टी ने विजय मिश्रा को टिकट देने से इनकार कर दिया और उनकी जगह विपुल दुबे को ज्ञानपुर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया. विजय मिश्रा ने जेल से चुनाव लड़ा लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे, जिससे उनकी दशकों पुरानी राजनीतिक सत्ता का अंत हुआ. उल्लेखनीय है कि लोक अभियोजक प्रवेश तिवारी ने विजय मिश्रा और उसके परिवार के खिलाफ संपत्ति कब्जाने वाले मामले में प्रभावी ढंग से पैरवी की, जिससे उनकी सजा सुनिश्चित हुई. वहीं जिला सरकारी अधिवक्ता दिनेश पांडे ने भी विजय मिश्रा के खिलाफ बलात्कार और अन्य आपराधिक मामलों में अभियोजन का नेतृत्व किया था.

गैंगरेप केस में भी दोषी

नवंबर 2023 में वाराणसी की अदालत ने एक महिला लोकगायिका के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में विजय मिश्रा को 15 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि एक जनप्रतिनिधि द्वारा ऐसा अपराध समाज के विश्वास के साथ विश्वासघात है. यह फैसला केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग पर न्यायपालिका की कठोर टिप्पणी भी था.

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विजय मिश्रा का नाम 2010 में तत्कालीन मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर हुए रिमोट कंट्रोल बम हमले के मामले में भी सामने आया था। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई थी. यह मामला उस दौर के अपराध-राजनीति गठजोड़ की गंभीरता को भी उजागर करता है.

मनी लॉन्ड्रिंग और करोड़ों की संपत्ति

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया कि विजय मिश्रा और उसके परिवार ने कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन को वैध बनाने के लिए कंपनियों और बेनामी निवेश का सहारा लिया. जांच एजेंसी ने दिल्ली, मुंबई, प्रयागराज और रीवा में करोड़ों रुपये की संपत्तियां कुर्क की हैं. सतर्कता जांच में भी यह पाया गया कि घोषित आय की तुलना में मिश्रा परिवार ने कई गुना अधिक संपत्ति अर्जित की. यह पूरा पैटर्न उस ‘सफेदपोश माफिया मॉडल’ को दर्शाता है जिसमें राजनीति, पैसा और अपराध एक-दूसरे से जुड़े होते हैं.

अपराध, सपा-बसपा और कांग्रेसी राजनीति का गठजोड़ है विजय मिश्रा

विजय मिश्रा सपा-बसपा और कांग्रेस के दौर की राजनीति का वह चेहरा था जहां बाहुबल, भय, दबाव और नेटवर्क के सहारे सत्ता और संपत्ति दोनों अर्जित किए जाते थे. विधायक रहने के दौरान उस पर हत्या, रंगदारी, अवैध कब्जा, धोखाधड़ी, अपहरण, जालसाजी, अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगातार लगते रहे. उसके और उसके सहयोगियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में 80 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं. उसकी कार्यप्रणाली सामान्य अपराधी जैसी नहीं थी. वह कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण, आर्थिक नेटवर्क और दबंगई के सहारे बड़े अपराधों को अंजाम देता था.