Automobile Desk : अक्सर गाड़ियों के एक्सीडेंट के बाद बीमा कंपनियां ड्राइविंग लाइसेंस (Driving license) की आड़ लेकर क्लेम खारिज करने की कोशिश करती हैं. लेकिन अगर कंपनी लाइसेंस में कमी बताकर पैसे देने से मना कर दे, तो यह मान लेना गलत होगा कि गाड़ी मालिक का अधिकार खत्म हो गया. हाल ही में पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम मामले पर सुनवाई करते हुए बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज कर दिया और पीड़ित ग्राहक के हक में बड़ा फैसला सुनाया. आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह क्लेम का पैसा ब्याज समेत चुकाए और ग्राहक को हुए मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा भी दे.

पूरा मामला एक लग्जरी कार के हादसे और उसके बाद उपजे क्लेम विवाद से जुड़ा है. पीड़ित व्यक्ति के पास स्कोडा न्यू लॉरा (Skoda New Laura) कार थी, जिसका बीमा 6.95 लाख रुपये की IDV (इन्श्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू) पर कराया गया था. 2014 में जब कार दुर्घटनाग्रस्त हुई, तो अधिकृत सर्विस सेंटर ने उसकी मरम्मत का अनुमानित खर्च करीब 5.28 लाख रुपये बताया. जब गाड़ी मालिक ने HDFC General Insurance Company से बीमा राशि की मांग की, तो कंपनी ने क्लेम देने से साफ इंकार कर दिया.

कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट करने के पीछे यह तर्क दिया कि दुर्घटना के समय जो व्यक्ति गाड़ी चला रहा था, उसके पास सही और वैध ड्राइविंग लाइसेंस (Driving license) नहीं था. बीमा कंपनी का दावा था कि ड्राइवर के पास नागालैंड से बना एक और लाइसेंस भी मौजूद था, जो फर्जी था. कंपनी ने इसे मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 6 का सीधा उल्लंघन बताते हुए अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लिया. इसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग की चौखट तक पहुंचा.

आयोग ने इस मामले में दोनों पक्षों के तर्कों को गहराई से समझा और बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि मोटर वाहन कानून के नियम तोड़ना और बीमा पॉलिसी का उल्लंघन होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं. अगर किसी चालक के पास दो लाइसेंस हैं या लाइसेंस प्रक्रिया में कोई खामी है, तो यह कानून का उल्लंघन हो सकता है और इसके लिए संबंधित व्यक्ति पर अलग से कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन सिर्फ इसी एक आधार पर बीमा कंपनी अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती और ना ही पॉलिसीधारक का क्लेम पूरी तरह रद्द कर सकती है.

इस फैसले में आयोग ने बीमा कंपनी को 3.5 लाख रुपये की राशि 7 सितंबर 2016 से 6 फीसदी सालाना ब्याज के साथ चुकाने का आदेश जारी किया है. अगर कंपनी 45 दिनों की निर्धारित अवधि में यह भुगतान नहीं करती है, तो उसे 9 फीसदी की बढ़ी हुई दर से ब्याज देना पड़ेगा. इसके अतिरिक्त, क्लेम के लिए सालों तक परेशान होने और मानसिक तनाव झेलने के बदले बीमा कंपनी को ग्राहक को 1 लाख रुपये का अलग से मुआवजा देने के निर्देश भी दिए गए हैं. हालांकि आयोग ने गाड़ी मालिक द्वारा मांगी गई पूरी IDV राशि (6.95 लाख रुपये) देने का दावा स्वीकार नहीं किया.

वाहन मालिकों के लिए यह फैसला एक बड़ी नजीर है. आमतौर पर इंश्योरेंस कंपनियां कागजी कमियों का फायदा उठाकर दावों को खारिज कर देती हैं. इस फैसले से यह बात साबित होती है कि बीमा कंपनी का हर रिजेक्शन लेटर अंतिम सच नहीं होता. गाड़ी मालिक को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह कार सौंपने से पहले ड्राइवर का लाइसेंस और उसकी गाड़ी चलाने की क्षमता जांच ले, लेकिन अगर इसके बाद भी कंपनी मनमाने तरीके से क्लेम खारिज करती है, तो उपभोक्ता अदालत का रुख करके अपना अधिकार हासिल किया जा सकता है.