मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को दिल्ली प्रवास के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो करीब आधे घंटे तक हुई इस मुलाकात में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद विभागों के बंटवारे को लेकर चर्चा हुई है. साथ ही यूपी बीजेपी संगठन को लेकर भी चर्चा हुई.

माना जा रहा है कि अब यूपी में जल्द संगठन, निगमों और आयोगों में खाली पड़े पदों पर भी भर्ती और नियुक्ति की जाएगी. बीजेपी ने कैबिनेट विस्तार के जरिए आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक संतुलन, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सहयोगी दलों के समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है.

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ये विधायक बनाए गए हैं मंत्री

भूपेंद्र चौधरी:- जाट राजनीति और पश्चिम यूपी का सबसे बड़ा चेहरा माने जाते है. चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद क्षेत्र से आते हैं. आम जन के बीच उनकी अच्छी खासी पकड़ है और योगी सरकार के पहले कार्यकाल में पंचायतीराज मंत्री की कमान संभाल चुके है. उन्होंने भाजपा प्रदेश अध्य़क्ष रहते संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वर्तमान में भूपेंद्र चौधरी एमएलसी हैं और उनका कार्यकाल साल 2028 तक है.

कृष्णा पासवान:- दलित समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली दलित कृष्णा पासवान का नाम भी मंत्री पद की रेस में आगे चल रहा है. सपा के पीडीए को टक्कर देने में पासवान की पहुंच और पहचान भाजपा को फायदा पहुंच सकती है. उनके मंत्री बनने से पूर्वांचल और मध्य यूपी में पासवान वोट बैंक को आसानी से साधा जा सकता है.

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हंसराज विश्वकर्मा:- पूर्वांचल की ओबीसी वोटों को साधने के लिए हंसराज विश्वकर्मा भाजपा के सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा हो सकते है. उनकी गिनती भाजपा के प्रमुख ओबीसी नेताओं में होती है. जिनकी वाराणसी, चंदौली, भदोही और आसपास के जिलों में अच्छी खासी पकड़ है. विश्वकर्मा लंबे समय से संगठन में भी सक्रिय रहे है। ऐसे में उनका मंत्री बनना लगभग तय है.

सुरेंद्र दिलेर:- मूल रूप से जाटव समाज से आने वाले खैर विधानसभा सीट के विधायक सुरेंद्र दिलेर का नाम भी मंत्री पद के लगभग तय माना जा रहा है. दिलेर राजनीतिक प्रष्ठभूमि वाले परिवार से ताल्लुक रखते है. उनके दादा किशन लाल दिलेर हाथरस लोकसभा सीट से चार बार सांसद रहे है. पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति के लिहाज से उनका नाम काफी प्रभावशाली माना जाता है.

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कैलाश सिंह राजपूत:- कैलाश राजपूत कन्नौज की तिर्वा से विधायक हैं, वो लोध बिरादरी से आते हैं. तिर्वा इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है. ऐसे में सपा का किला भेदने के लिए कैलाश राजपूत काफी अहम भूमिका निभा सकते है. उन्होंने 1996 में तिर्वा विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी. इसके बाद वे बसपा चले गए और 2017 के विधानसभा चुनाव में फिर से भाजपा के साथ जुड़े.

मनोज पांडेय:- समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री रह चुके है. मनोज पांडेय की गिनती प्रदेश के कद्दावर ब्राह्मण नेता के रूप में होती है. ब्राह्मण वोट को साधने और इनके जरिये सपा के वोटर्स में सेंध लगाने के लिए मंत्री पद दिया जा रहा है. बता दें कि पांडेय ने लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी से दूरी बनाई और खुलकर भाजपा का समर्थन किया था. जिसके बाद से ही उनके नाम की चर्चा चल रही थी.