महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों और पढ़ाई में मिलने वाले 5 प्रतिशत आरक्षण का मामला में बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. एक वकील ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि सरकार ने यह आरक्षण गलत तरीके से खत्म किया. महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि वर्ष 2014 में मुस्लिम समुदाय को दिया गया 5 प्रतिशत आरक्षण उसी वर्ष दिसंबर में समाप्त हो गया था। इसलिए फरवरी 2026 के सरकारी प्रस्ताव द्वारा किसी भी मौजूदा आरक्षण को समाप्त नहीं किया गया।
महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि मुस्लिमों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने वाला 2014 का अध्यादेश उसी साल खत्म हो गया था. अब इस मामले में 4 मई को अहम सुनवाई होगी.
जस्टिस रियाज़ छागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ वकील एजाज़ नक़वी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में 17 फरवरी 2026 के उस सरकारी प्रस्ताव को चुनौती दी गई, जिसके जरिए राज्य ने 2014 के मुस्लिम आरक्षण संबंधी प्रावधान वापस लिए थे।
17 फरवरी 2025 को महाराष्ट्र सरकार ने एक नया सरकारी आदेश यानी GR जारी किया. इस आदेश में कहा गया कि मुस्लिम समुदाय को ‘स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी A’ में रखते हुए जो भी पुराने फैसले, आदेश और सर्कुलर 2014 में जारी हुए थे, वो सब रद्द किए जाते हैं. साथ ही मुस्लिम समुदाय को जो जाति प्रमाण पत्र और नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट दिए जाते थे, वो भी बंद कर दिए गए.
वकील सैयद एजाज नकवी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उन्होंने कहा कि सरकार का यह फैसला मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव है. उन्होंने इसे संविधान के खिलाफ बताया और कहा कि यह ‘नस्लीय भेदभाव’ है. उनकी मांग थी कि सरकार के इस आदेश को रद्द किया जाए.
महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग ने हाईकोर्ट में अपना जवाब यानी हलफनामा दाखिल किया. सरकार ने कई अहम बातें कहीं. पहली बात यह कि 2014 का अध्यादेश उसी साल दिसंबर में खुद खत्म हो गया था. उसे कभी कानून का रूप नहीं दिया गया.
दूसरी बात यह कि फरवरी 2025 का सरकारी आदेश पूरी तरह कानूनी है और उसमें कुछ भी गलत नहीं है. सरकार ने कहा कि हमने कोई नया आरक्षण नहीं छीना क्योंकि आरक्षण था ही नहीं.
तीसरी बात यह कि भारत का संविधान सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण देने की इजाजत नहीं देता. इसलिए मुस्लिम समुदाय को सिर्फ इसलिए आरक्षण नहीं दिया जा सकता क्योंकि वो मुस्लिम हैं.
चौथी बात यह कि सरकार ने याचिका में लगाए गए ‘नस्लीय भेदभाव’ के आरोपों को बेबुनियाद और गलत बताया.
पांचवीं बात यह कि कोर्ट यह नहीं कह सकती कि विधानसभा कोई कानून बनाए या कोई पुराना अध्यादेश फिर से लागू करे क्योंकि कानून बनाना विधानसभा का काम है कोर्ट का नहीं.
जुलाई 2014 में तब की कांग्रेस-NCP सरकार ने एक बड़ा फैसला किया. उसने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐलान किया. यह आरक्षण सरकारी नौकरियों और पढ़ाई दोनों में दिया जाना था. इन दोनों समुदायों को ‘सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग’ की श्रेणी में रखा गया.
लेकिन इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट ने नौकरियों में मुस्लिम आरक्षण खत्म कर दिया लेकिन पढ़ाई में 5 प्रतिशत आरक्षण जारी रहने दिया.
न्यायमूर्ति रियाज इकबाल छागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच इस याचिका पर 4 मई को सुनवाई करेगी. उस दिन यह तय होगा कि कोर्ट इस मामले में आगे क्या करेगी.
राज्य सरकार ने सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग की उप सचिव वर्षा देशमुख के हलफनामे के माध्यम से अदालत को बताया कि याचिका भ्रामक है और इसे भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए। राज्य ने कहा कि यह अध्यादेश 23 दिसंबर 2014 को स्वतः समाप्त हो गया और उसके बाद इसे किसी वैध कानून के रूप में लागू नहीं किया गया। इसलिए इसके आधार पर कोई प्रवर्तनीय अधिकार शेष नहीं है।
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