दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने यौन अपराधों से जुड़े भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों को जेंडर न्यूट्रल (gender-neutral) बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की है। याचिका में मांग की गई है कि बलात्कार जैसे गंभीर यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित की पहचान केवल महिला तक सीमित न रहे, बल्कि पुरुष और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी समान कानूनी संरक्षण मिले। याचिका में दलील दी गई है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में यौन अपराधों को लेकर पीड़ितों और आरोपियों के लिंग के आधार पर अलग-अलग प्रावधान हैं। ऐसे में कानून में बदलाव कर सभी पीड़ितों के लिए समान सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान कानून में पुरुषों, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और जानवरों के साथ बिना सहमति किए जाने वाले कुछ अप्राकृतिक यानी गैर-योनि यौन कृत्यों से निपटने के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। याचिका के मुताबिक, BNS में बलात्कार की मौजूदा परिभाषा इस तरह तैयार की गई है कि इसमें पुरुष आरोपी और महिला पीड़िता की स्थिति को केंद्र में रखा गया है। इसके कारण ऐसे मामलों में कानूनी संरक्षण को लेकर सवाल खड़े होते हैं, जहां पीड़ित महिला नहीं है। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर यौन अपराधों से जुड़े प्रावधानों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की है, ताकि अपराध की प्रकृति के आधार पर कार्रवाई हो और पीड़ित के लिंग के कारण उसे अलग कानूनी स्थिति का सामना न करना पड़े।
यह याचिका वकील शुभी श्रीवास्तव और अन्य की ओर से दायर की गई है। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को निर्धारित की है। हाई कोर्ट ने कहा कि इस जनहित याचिका पर पहले से लंबित इसी तरह की याचिकाओं के साथ सुनवाई की जाएगी। इससे BNS में यौन अपराधों से जुड़े प्रावधानों की लिंग-विशिष्टता और पुरुषों तथा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कानूनी संरक्षण के मुद्दे पर व्यापक सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।
‘अपराध को परिभाषित करना विधायिका का काम’
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नए अपराध को परिभाषित करना और उसके लिए कानूनी प्रावधान बनाना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत किसी प्रावधान की व्याख्या को इस तरह नहीं बदल सकती, जिससे नया अपराध अस्तित्व में आ जाए। कोर्ट ने कहा कि यह मूल रूप से विधायी नीति (Legislative Policy) का विषय है। बेंच ने टिप्पणी की कि किसी कृत्य को अपराध घोषित करना और उसकी कानूनी परिभाषा तय करना विधायिका का काम है। अदालत ने कहा, “हम यहां किसी प्रावधान की व्याख्या बदलने या यह तय करने के लिए नहीं बैठे हैं कि क्या अपराध माना जाएगा। आखिरकार, यह फैसला विधायिका को ही लेना है।” कोर्ट ने यह भी कहा कि अपराधों को परिभाषित करना संसद द्वारा तय की जाने वाली विधायी नीति का हिस्सा है और इस क्षेत्र में न्यायपालिका की भूमिका सीमित है।
अन्य लिंगों को महिलाओं जैसा संरक्षण नहीं
BNS के तहत यौन अपराधों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग वाली जनहित याचिका में पुरुषों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कानूनी संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 जैसे पुराने प्रावधान के BNS में समान रूप से मौजूद नहीं होने के कारण पुरुषों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले कुछ गैर-सहमति वाले यौन कृत्यों से निपटने के लिए कानूनी सुरक्षा का अंतर पैदा हुआ है।
महिलाओं के समान संरक्षण की मांग
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुरुष और ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी यौन अपराधों के शिकार हो सकते हैं। ऐसे में कानून के तहत उन्हें भी महिलाओं के समान प्रभावी संरक्षण मिलना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि किसी व्यक्ति के लिंग के आधार पर यौन अपराधों से मिलने वाली कानूनी सुरक्षा अलग नहीं होनी चाहिए। इसी आधार पर BNS के संबंधित प्रावधानों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई है।
धारा 377 का भी उठाया गया मुद्दा
याचिका में IPC की धारा 377 का हवाला देते हुए कहा गया है कि पुराने कानून में कुछ ऐसे यौन कृत्यों के खिलाफ प्रावधान था, जो महिला-पीड़ित वाली पारंपरिक रेप की परिभाषा के दायरे में नहीं आते थे। BNS में इसकी अनुपस्थिति के कारण पुरुष और ट्रांसजेंडर पीड़ितों के लिए कानूनी स्थिति को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया है कि किसी नए अपराध को परिभाषित करना या आपराधिक कानून में नया प्रावधान जोड़ना विधायिका का क्षेत्र है। अदालत ने कहा है कि वह अपनी व्याख्या के जरिए नया अपराध नहीं बना सकती।
एक और PIL हाई कोर्ट में लंबित
BNS में गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन कृत्यों से निपटने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान की मांग को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक अन्य जनहित याचिका भी लंबित है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, गंतव्य गुलाटी की ओर से दायर इस अलग PIL में मांग की गई है कि आपराधिक कानून में ऐसे प्रावधान किए जाएं, जो बिना सहमति वाले अप्राकृतिक यौन कृत्यों को अपराध की श्रेणी में रखकर पीड़ितों को कानूनी संरक्षण दे सकें। याचिका में इसे पुराने IPC की धारा 377 से जुड़े कानूनी मुद्दे के संदर्भ में उठाया गया है। गुलाटी की याचिका में दावा किया गया है कि बिना सहमति वाले ऐसे यौन कृत्यों के मामलों में LGBTQ समुदाय के सदस्यों के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा की तत्काल जरूरत है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन कृत्य किया जाता है, तो केवल पीड़ित के लिंग या यौन पहचान के आधार पर उसे आपराधिक कानून के तहत कम संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
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