अनमोल मिश्रा, सतना। एमपी के सतना में नियम और कानून के अनुसार, पोस्टमार्टम अर्थात शव परीक्षण के दौरान स्कूल के बच्चों का वहां मौजूद रहना पूरी तरह से गलत और नियमों के खिलाफ है। अगर किसी स्कूल या संस्थान द्वारा ऐसा किया जाता है, तो यह बाल अधिकारों का उल्लंघन है और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इसके बावजूद यहां जिला अस्पताल की मर्चुरी में स्कूल की दो छात्राओं की मौजूदगी में शुक्रवार की दोपहर शव (कंकाल) का परीक्षण किया गया।

तकरीबन 1.45 बजे परीक्षण शुरू हुआ और लगभग 3.35 बजे टीम बाहर निकली, इस दौरान दोनों छात्राएं परीक्षण कक्ष में मौजूद रहीं। अब यह जांच का विषय है कि यह स्कूली छात्राएं किसकी अनुमति से स्कूल यूनिफार्म में तकरीबन पौने दो घंटे तक शव परीक्षण कक्ष में मौजूद रहीं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक,परीक्षण कक्ष में मेडिकल कॉलेज के डॉ. प्रतीक शुक्ला और अन्य तीन लोग मौजूद थे। वहां दुर्गेश के शव का परीक्षण किया जा रहा था। 

उल्लेखनीय है कि स्कूल के स्तर पर मानव शरीर रचना को किताबों, चार्ट या 3 डी मॉडल्स के जरिए आसानी से समझाया जा सकता है। इसके लिए वास्तविक शव परीक्षण दिखाना बिल्कुल भी जरूरी या उचित नहीं है। केवल मेडिकल, फॉरेंसिक या नर्सिंग के उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे वयस्क छात्रों के लिए ही यह प्रशिक्षण होता है।

मेडिकल में स्पष्ट नियम हैं कि स्कूल की छात्राएं या छात्र पोस्टमार्टम के दौरान शवगृह में मौजूद नहीं रह सकते। भारत के कानूनी और मेडिकल नियमों के अनुसार, स्कूल के छात्रों का पोस्टमार्टम कक्ष के भीतर जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। पोस्टमार्टम से जुड़े नियम कहते हैं मेडिको-लीगल (कानूनी-चिकित्सीय) पोस्टमार्टम एक बेहद गोपनीय और संवेदनशील कानूनी प्रक्रिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और विभिन्न राज्यों के फॉरेंसिक मेडिकल मैनुअल के अनुसार, पोस्टमार्टम रूम में आम जनता, बाहरी लोग या स्कूली बच्चों का प्रवेश सख्त मना है। 

वहां केवल वही लोग मौजूद रह सकते हैं जिन्हें कानूनन अनुमति प्राप्त हो। किसी भी बाहरी व्यक्ति या स्कूली छात्रों की उपस्थिति से साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गोपनीयता भंग होने का जोखिम रहता है। यदि कोई डॉक्टर या अस्पताल प्रशासन नियमों का उल्लंघन कर बाहरी बच्चों को मर्चुरी में ले जाता है, तो यह कानूनी अपराध और मेडिकल एथिक्स का गंभीर उल्लंघन माना जाता है, जिसके लिए उन पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।

बच्चों को देखने की अनुमति नहीं

पोस्टमार्टम कक्ष एक प्रतिबंधित क्षेत्र होता है। वहां केवल अधिकृत चिकित्सा कर्मी, फॉरेंसिक एक्सपर्ट और जांच अधिकारी ही जा सकते हैं। मृत व्यक्ति और उसके परिवार की गोपनीयता और सम्मान का कानूनी अधिकार होता है। बाहरी लोगों या बच्चों को इसे देखने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती। बच्चों का दिमाग संवेदनशील होता है। शव को क्षत-विक्षत स्थिति में देखना उनके मन पर गहरा आघात पहुंचा सकता है। 

ऐसी घटनाओं को देखने से बच्चों में पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, रात को डरना, डरावने सपने आना या एंग्जायटी (घबराहट) जैसी मानसिक बीमारियां हो सकती हैं। पोस्टमार्टम रूम में कई तरह के बैक्टीरिया, वायरस और खतरनाक रासायनिक गंध होती है। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों से कम होती है। वहां मौजूद रहने से उन्हें गंभीर संक्रमण होने का खतरा रहता है।

इस मामले में एमएलबी स्कूल की प्राचार्य शीला सिंह ने बताया कि शनिवार को पीएससी की परीक्षा होने के कारण शुक्रवार को हाफ डे कर दिया था। स्कूल प्रबंधन की ओर से किसी छात्रा को पोस्टमार्टम रूम जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। अगर बिना अनुमति छात्राएं गई हैं तो उनके विरूद्ध नियम अनुसार कार्रवाही करते हुए उनके परिजनों को सूचित करेंगे।

पुलिस के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ महेंद्र सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम रूम प्रतिबंधित क्षेत्र होता है, वहां बिना अनुमति कोई प्रवेश नहीं कर सकता। अगर स्कूल की छात्राएं पोस्टमार्टम के दौरान वहां डॉक्टरों के साथ मौजूद थी, तो यह अनुचित है।

सीएमएचओ डॉ मनोज शुक्ला ने बताया कि पोस्टमार्टम रूम में प्रशिक्षण का कोई शेड्यूल हमारे यहां नहीं है। मेडिकल कॉलेज वाले ही बता सकेंगे कि फॉरेंसिक में उनके नियम कायदे क्या हैं। ड्यूटी स्टाफ के अलावा पोस्टमार्टम के दौरान कोई बाहरी व्यक्ति मौजूद नहीं रह सकता। विशेष स्थितियों में मृतक के परिजनों को अनुमति के आधार पर बुलाया जाता है।

मेडिकल कालेज के डीन डॉ एस पी गर्ग ने बताया कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि स्कूल के बच्चों को पोस्टमार्टम के दौरान कोई प्रशिक्षण दिया जाए। एमबीबीएस के छात्र छात्राओं को अनुमति के बाद वहां भेजा जाता है। अगर स्कूल के बच्चे मर्चुरी में मौजूद रहे तो इसकी जानकारी हम जुटाएंगे।

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