दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस से सटे सत्य निकेतन (Satya Niketan) इलाके में 5 मंजिला पेइंग गेस्ट (PG) इमारत ढहने की घटना ने राजधानी को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे में अब तक 6 छात्रों की मौत हो चुकी है, जबकि 11 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया है। मलबे में फंसे लोगों की तलाश के लिए सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। जानकारी के मुताबिक, करीब 55 स्क्वेयर यार्ड में बनी यह इमारत 1990 के दशक के आखिर में तैयार की गई थी। बाद में इसे मल्टी-स्टोरी PG में तब्दील कर दिया गया। घनी आबादी और संकरी गली में स्थित इस इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे।
15 साल में चौथी ऐसी घटना
सत्य निकेतन की इस घटना ने राजधानी में पुराने और जर्जर भवनों के साथ-साथ अवैध तरीके से संचालित किए जा रहे PG को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले 15 वर्षों में इस तरह की यह चौथी घटना बताई जा रही है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं के बावजूद आखिर पुराने भवनों की सुरक्षा और PG संचालन के नियमों की निगरानी कितनी प्रभावी है, यह सवाल अब प्रशासन के सामने है। हादसे के बाद MCD ने आसपास की जर्जर इमारतों पर भी कार्रवाई शुरू कर दी है। दुर्घटनाग्रस्त इमारत से सटे मकान नंबर 13 को खतरनाक घोषित कर नोटिस जारी किया गया है। साथ ही इलाके की अन्य पुरानी और बहुमंजिला इमारतों के सुरक्षा ऑडिट पर भी जोर दिया जा रहा है।
NDRF के स्निफर डॉग्स से मलबे में जिंदगी की तलाश
बहरहाल, NDRF की विशेष टीमें घटनास्थल पर लगातार राहत और बचाव अभियान में जुटी हुई हैं। मलबे के विशाल ढेर में दबे लोगों का सुराग लगाने के लिए NDRF के विशेष रूप से प्रशिक्षित स्निफर डॉग्स की मदद ली जा रही है। बचावकर्मी आधुनिक उपकरणों के जरिए मलबे को सावधानीपूर्वक हटाने के साथ-साथ उन संभावित स्थानों की तलाश कर रहे हैं, जहां किसी के दबे होने की आशंका है।
1- क्या बिना परमिशन अवैध रूप से जोड़े गए थे अतिरिक्त फ्लोर?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय निवासियों का दावा है कि MCD के रिकॉर्ड में इस इमारत को P-14 के तौर पर मार्क किया गया था। इसमें बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के अलावा चार मंजिलें थीं। आरोप है कि करीब दो साल पहले बिना जरूरी अनुमति के इमारत में दो और फ्लोर जोड़ दिए गए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि घनी आबादी वाले सत्य निकेतन जैसे इलाके में कथित तौर पर बिना अनुमति अतिरिक्त निर्माण कैसे होता रहा? अगर निर्माण नियमों के खिलाफ किया गया था, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित विभागों को नहीं थी? और अगर जानकारी थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
2- बिना स्ट्रक्चरल असेसमेंट के कैसे चल रहा था रिपेयरिंग का काम?
हादसे से करीब एक सप्ताह पहले से इमारत के बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर मरम्मत का काम चल रहा था। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि जब भवन में पहले से नमी, पानी का जमाव और दरारें दिखाई दे रही थीं, तो मरम्मत शुरू करने से पहले उसकी संरचनात्मक मजबूती की जांच क्यों नहीं कराई गई? पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि क्या रिपेयरिंग का काम शुरू करने से पहले किसी योग्य इंजीनियर से स्ट्रक्चरल असेसमेंट कराया गया था। अगर इमारत की हालत पहले से कमजोर थी, तो मरम्मत के दौरान उसकी संरचना पर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन किया गया था या नहीं?
3- सुरक्षा मानकों और इमरजेंसी एग्जिट की अनदेखी का जिम्मेदार कौन?
सत्य निकेतन की इस इमारत में सेफ्टी चेक से जुड़ा कोई रिकॉर्ड नहीं मिलने और इमरजेंसी की स्थिति में बाहर निकलने के लिए अलग Emergency Exit नहीं होने को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पांच मंजिला इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे, ऐसे में आग, भूकंप या किसी अन्य आपात स्थिति में सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था कितनी जरूरी थी, यह हादसे के बाद साफ तौर पर सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, ‘हॉस्टल डेज’ नाम की कंपनी को लीज पर देकर यह PG संचालित किया जा रहा था। यहां छात्रों से कथित तौर पर 14 हजार से 18 हजार रुपये प्रति बेड तक किराया लिया जा रहा था। ऐसे में सवाल उठता है कि छात्रों से इतनी बड़ी रकम वसूले जाने के बावजूद उनकी सुरक्षा के बुनियादी इंतजामों की निगरानी क्यों नहीं की गई?
4- 15 साल में 4 हादसे, क्या पिछली त्रासदियों से कोई सबक नहीं लिया गया?
299 घरों वाली इस रिसेटलमेंट कॉलोनी में पिछले 15 वर्षों में इमारतों से जुड़े हादसों की यह चौथी घटना बताई जा रही है। इससे पहले 2022 में हुए एक हादसे में दो लोगों की जान चली गई थी। इसके बावजूद इलाके की पुरानी और जर्जर इमारतों की सुरक्षा को लेकर स्थायी और प्रभावी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। बार-बार हादसे होने के बावजूद आखिर पुरानी इमारतों का नियमित फायर और स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट क्यों नहीं किया गया? क्या पिछली घटनाओं के बाद खतरनाक भवनों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी? अगर की गई थी, तो फिर सत्य निकेतन में इस तरह की स्थिति कैसे बनी रही?
5- दिखती दरारों और शिकायतों पर क्यों सोता रहा नगर निगम?
स्थानीय लोगों का दावा है कि हादसे का शिकार हुई इमारत में काफी समय से दरारें साफ दिखाई दे रही थीं। इसके बावजूद इमारत की सुरक्षा को लेकर समय रहते कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, MCD का कहना है कि उसके पास इस इमारत को लेकर कोई आधिकारिक लिखित शिकायत नहीं आई थी। MCD के इस दावे के बाद अब निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। अगर किसी इमारत में दरारें या जर्जरता बाहर से साफ नजर आ रही थी, तो क्या उसकी जांच के लिए प्रशासन को केवल लिखित शिकायत का इंतजार करना चाहिए था?
जांच के दायरे में लीज एग्रीमेंट और मकान मालिक
पुलिस की जांच में सामने आया है कि हादसे वाली यह प्रॉपर्टी गुड़गांव निवासी तीन भाइयों हरि राम बंसल, आनंद बंसल और आजाद बंसल की है। बताया जा रहा है कि तीनों ने यह संपत्ति पिछले साल एक कंपनी को लीज पर दी थी, जिसके बाद यहां PG का संचालन किया जा रहा था। हादसे के बाद पुलिस अब लीज एग्रीमेंट, PG संचालन से जुड़ी अनुमतियों और भवन की संरचनात्मक स्थिति की जांच कर रही है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या इमारत के लोड-बेयरिंग पिलर्स में किसी तरह का बदलाव किया गया था और क्या भवन की मूल संरचना के साथ कोई छेड़छाड़ हुई थी। इसके अलावा पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि इमारत में मौजूद संभावित स्ट्रक्चरल खामियों की जानकारी मकान मालिक या PG संचालक को थी या नहीं।
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