कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी शिक्षक बने कर्मचारियों की अपील खारिज करते हुए साफ कहा कि अदालत में वही व्यक्ति आए, जिसके हाथ साफ हों। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी हर अधिकार और दावे को खत्म कर देती है। मेडिकल रिकॉर्ड और दोबारा सत्यापन में प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने के बाद नियुक्तियां रद्द करने के फैसले को भी हाईकोर्ट ने पूरी तरह सही ठहराया।

ग्वालियर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी शिक्षक बने कर्मचारियों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सभी अपीलें खारिज करते हुए कहा कि अदालत से राहत पाने के लिए व्यक्ति का आचरण निष्कलंक होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “साफ हाथों से ही अदालत आया जाए, क्योंकि धोखाधड़ी सब कुछ नष्ट कर देती है।”

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सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि जिन दिव्यांग प्रमाण पत्रों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, उनका मेडिकल बोर्ड के रिकॉर्ड और फाइलिंग रजिस्टर में कोई उल्लेख नहीं मिला। कोर्ट के निर्देश पर कराए गए दोबारा सत्यापन में भी प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता कोई विश्वसनीय मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सके और केवल तकनीकी आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

अदालत ने यह भी माना कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मिली सरकारी नौकरी का कोई कानूनी संरक्षण नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब सरकारी रिकॉर्ड स्वयं फर्जीवाड़े की पुष्टि कर रहे हों, तब केवल सुनवाई का अवसर न मिलने की दलील के आधार पर नियुक्ति रद्द करने का आदेश निरस्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने शासन की कार्रवाई को पूरी तरह वैध मानते हुए फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की सभी अपीलें खारिज कर दीं।

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