देहरादून. पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश में जमीन खरीदी-बिक्री का मुद्दा उठाया है. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में जमीन अर्थात् भूमि, मिट्टी बचाने का प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है. उत्तराखंड के लोगों ने हिमाचल को इस दिशा में प्रेरक माना. पहले निर्वाचित सरकार ने भूमि की खरीद-फरोख्त को नियंत्रित किया. दूसरी निर्वाचित सरकार ने उसे और कड़ा किया. भूमि बिकने से कब प्रतिबंध हटा, यह सारे उत्तराखंड ने देखा. विरोध में स्वर भी उठे, लोकतंत्र में नियंता तो जानता ही है. स्पष्ट बात है, भूमि खरीद-फरोख्त से नियंत्रण हटाने को जनता ने अपनी स्वीकृति दे दी और परिणाम निर्विवाद रूप से बड़े पैमाने पर जमीनें बिकती गईं, बिकती गईं और बिकती जा रही हैं. कौन खरीद रहा है, यह किसी को मालूम नहीं है! यहां तक कि जिलाधिकारियों को भी मालूम नहीं है.
रावत ने कहा मिट्टी का सीधा सवाल परिवेश से है, तो मिट्टी, परिवेश, संस्कृति और आजीविकाएं ये सभी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को, जो राज्य बनने से पहले यहां न रह रहा हो, उसको भूमि खरीदने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. ग्रामीण अंचलों में शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश चाहिए. हमें रिजॉर्ट कल्चर के बजाय कई यूरोपीय देशों की तरह, जिन्होंने होमस्टे, ब्रेड एंड बटर जैसी योजनाएं प्रारंभ कीं ताकि स्थानीय आजीविका को बढ़ावा दिया जा सके, उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.
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रावत ने आगे कहा कि हमने जमीन खरीदने से जब रोक ही हटानी है तो किस उपयोग में वह जमीन लाई जाए? यदि वह भूमि कृषि, बागवानी, चिकित्सा और शिक्षा के अतिरिक्त किसी अन्य उपयोग में लाई जा रही है, तो उस संदर्भ में राज्य को कानून बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए. क्षेत्र निश्चित करने चाहिए कि किन क्षेत्रों में खरीदी गई जमीन कानून सम्मत मानी जाएगी और किन क्षेत्रों में इस तरीके की जमीन कानून सम्मत नहीं मानी जाएगी. संवैधानिक संरक्षण भी उसी स्थिति में कारगर होंगे जब जमीन बचेगी या बची होगी.
पूर्व सीएम ने कहा राज्य के अंदर उपयोगी भूमि का एक बड़ा हिस्सा बिक चुका है. यहां तक कि भराड़ीसैंण के आस-पास जिस भूमि को 2015-16 में नोटिफाइड कर बिक्री पर रोक लगा दी गई थी, वह नोटिफिकेशन हटा दिया गया और वहां भी जमीनें अंधाधुंध बिक रही हैं ताकि जब भूमि ही नहीं रहेगी, तो राजधानी या दूसरे प्रश्न के लिए जब भूमि की आवश्यकता पड़ेगी, तो भूमि कहां से खोज कर लाएंगे? शायद कुछ लोगों की कल्पना में राज्य की राजधानी अलकापुरी के तरीके से कहीं आसमान में हो. कुछ गंभीर प्रश्न हैं, जिन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है. लोगों की चिंता स्वाभाविक और उचित है. समाधान के लिए उपलब्ध उपायों पर पारस्परिक चर्चा भी आवश्यक है. चर्चा का दायरा संकीर्ण न होकर “9 नवंबर, 2000” में प्राप्त राज्य के भौगोलिक दायरे को ध्यान में रखकर सोचा जाना चाहिए और एक राय बनाकर आगे बढ़ना चाहिए.

