लखनऊ। उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने और उन्हें ही प्रशासक बनाए जाने के योगी सरकार के फैसले पर अब सियासत गरमा गई है। इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसके बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी इस मामले में अप्रत्यक्ष रूप से कानूनी अड़ंगा लगाने की कोशिश कर रही है।

हाल ही में योगी सरकार ने प्रदेश के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला लिया था। सरकार का कहना था कि बोर्ड परीक्षाओं, जनगणना और आगामी विधानसभा चुनाव के चलते समय पर पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं है। ऐसे में ग्राम पंचायतों का कामकाज प्रभावित न हो, इसलिए ग्राम प्रधानों को सीमित अवधि के लिए प्रशासक बनाए जाने का निर्णय लिया गया। इस फैसले का बड़ी संख्या में ग्राम प्रधानों ने स्वागत भी किया था।

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याचिका के बाद शुरू हुई सियासत

अब सरकार के इस फैसले के खिलाफ एक वकील की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इसके बाद सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर जारी है। लोग आरोप लगा रहे हैं कि याचिकाकर्ता का संबंध समाजवादी पार्टी से है।
कई सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि सपा सीधे तौर पर सरकार के फैसले का विरोध नहीं कर पा रही थी, इसलिए उसने कानूनी अड़ंगा लगाया है। कई लोग सपा को चेतावनी भी दे रहे हैं कि यूपी की राजनीति में ग्राम प्रधानों की मजबूत भूमिका होती है। ऐसे में उनके कामकाज में बाधा डालने की कोशिश राजनीतिक रूप से सपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

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प्रधानों को ही प्रशासक क्यों बनाया गया?

दरअसल, जब यह साफ हो गया कि जनगणना, चुनावी तैयारियों और परीक्षाओं के कारण पंचायत चुनाव समय पर कराना मुश्किल होगा, तब प्रदेश के कई ग्राम प्रधानों ने सरकार से मांग की कि उन्हें ही प्रशासक बनाया जाए। इसके बाद योगी सरकार ने इस मांग को स्वीकार करते हुए प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का फैसला लिया।

राजनीतिक तौर पर इसे एक अहम फैसला माना जा रहा है। यूपी के इतिहास में यह पहला मौका है जब ग्राम प्रधानों को ही प्रशासकीय जिम्मेदारी दी गई है। पहले ऐसी स्थिति में आमतौर पर अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता था।

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क्यों अहम था योगी सरकार का ये फैसला?

दरअसल, ग्राम प्रधान अपनी ग्राम सभा की जरूरतों और स्थानीय समस्याओं को बेहतर तरीके से समझते हैं, क्योंकि वे सीधे जनता के बीच काम करते हैं। दूसरी ओर, अधिकारी कई बार बाहरी क्षेत्रों से आते हैं और उनकी स्थानीय जनता के प्रति सीधी जवाबदेही नहीं होती।

इसके अलावा, पहले जब अधिकारियों को प्रशासक बनाया गया, तब कई बार भ्रष्टाचार और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही को लेकर सवाल उठे थे। यही वजह बताई जा रही है कि इस बार ग्राम प्रधानों को ही जिम्मेदारी देना ज्यादा व्यावहारिक और प्रभावी विकल्प माना गया।