नदी यात्रा से लौटकर वैभव बेमेतरिहा की रिपोर्ट

रायपुर। कभी रायपुर की जीवनदायिनी कही जाने वाली खारुन नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। जिस नदी के पानी से कभी लोग प्यास बुझाते थे, उसी नदी का पानी अब न पीने लायक बचा है, न नहाने योग्य। प्राकृतिक बहाव को जगह-जगह बने एनीकेटों ने रोक दिया है। शहर के गंदे नालों और फैक्ट्रियों के रासायनिक अपशिष्ट ने नदी को प्रदूषण की ऐसी चादर में लपेट दिया है कि कई किलोमीटर तक पानी दिखाई ही नहीं देता, सिर्फ जलकुंभी का हरा विस्तार नजर आता है।

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नदी का पानी कहीं काला है, कहीं हरा तो कहीं मटमैला। प्लास्टिक कचरा, शराब की खाली बोतलें और घरेलू अपशिष्ट नदी के किनारों पर बिखरे पड़े हैं। विशेषकर रायपुर जिले से गुजरने वाली खारुन की हालत सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देती है।

‘खारुन करुण कथा’ की पिछली दो कड़ियों में तरीघाट से महादेव घाट तक की बदहाली का चित्र सामने रखा गया था। तीसरी कड़ी में महादेव घाट से सोमनाथ तक की पदयात्रा की आँखों देखी कहानी।

महादेव घाट से शुरू हुई बदहाली की तस्वीर

महादेव घाट स्थित खारुन पुल के नीचे से हमारी टीम ने यात्रा शुरू की। पहले ही कदम पर नदी की पीड़ा सामने थी। पुल के नीचे प्लास्टिक कचरे का ढेर, जलकुंभी का घना फैलाव और काले पड़ चुके पानी ने साफ संकेत दे दिया कि खारुन अब एक बीमार नदी बन चुकी है।

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जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ी, नदी का बहता पानी कम और जलकुंभी का साम्राज्य अधिक दिखाई देता गया। रायपुरा, सरोना और चंदनडीह तक नदी लगभग पूरी तरह जलकुंभी से ढकी मिली। कई स्थानों पर शहर के गंदे नाले सीधे नदी में गिरते दिखाई दिए।

नदी के दूसरे किनारे, दुर्ग जिले के भोथलीडीह के पास एक बड़ा ईंट-भट्ठा नदी तक फैल चुका है। जिस हिस्से में भट्ठा संचालित हो रहा है, वहाँ नदी के तट का कटाव भी साफ दिखाई देता है।

गंदे पानी में नहाने को मजबूर लोग

सरोना के पंप हाउस के पास बने एनीकेट के नीचे चंदनडीह के ग्रामीण उसी प्रदूषित पानी में नहाते मिले।

ग्रामीण बताते हैं कि 15-16 साल पहले खारुन का पानी साफ रहता था। नदी में पर्याप्त बहाव होता था और लोग उसका पानी पीने तक इस्तेमाल करते थे। आज स्थिति यह है कि पानी न पीने लायक बचा है और न ही स्नान योग्य।

इसके बावजूद लोगों की मजबूरी है कि गाँव में अब भी हर घर तक नल-जल योजना नहीं पहुँची है। जहाँ सार्वजनिक नल लगे हैं, वहाँ भी पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

फार्म हाउसों ने रोक दिया नदी का रास्ता

चंदनडीह से आगे अटारी मार्ग पर स्थित एक फिल्टर प्लांट का अपशिष्ट भी खारुन में ही समा जाता है। इसके बाद नदी किनारे का प्राकृतिक रास्ता बड़े-बड़े फार्म हाउसों की घेराबंदी से बंद हो जाता है। नंदनवन तक पहुँचने के लिए हमारी टीम को नदी छोड़कर दूसरे रास्ते से जाना पड़ा।

नंदनवन में भूजल का सहारा, लेकिन नदी बेकार

नंदनवन के ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ फिलहाल पेयजल संकट नहीं है। नदी किनारे होने के कारण लगभग 50 फीट की गहराई पर भूजल मिल जाता है, और अधिकांश घरों में बोरवेल हैं। लेकिन नदी का पानी प्रदूषण के कारण किसी उपयोग का नहीं रह गया है।

गोमची के पास नदी के दूसरे किनारे फिर एक ईंट-भट्ठा दिखाई देता है। इसी क्षेत्र में खारुन एक पतली धारा में सिमट जाती है। आगे खेती के लिए की गई घेराबंदी के कारण नदी किनारे पैदल चलना भी संभव नहीं रह जाता।

पठारीडीह : जहाँ नदी के साथ भूजल भी जहर बन गया

गुमा से आगे बढ़ते ही फैक्ट्रियों के रासायनिक अपशिष्ट का असर साफ दिखाई देने लगता है। पठारीडीह पहुँचते-पहुँचते खारुन का पानी पूरी तरह रासायनिक प्रदूषण से प्रभावित नजर आता है।

सबसे गंभीर स्थिति नई बस्ती की है, जो नदी से लगभग 500 मीटर दूर है। ग्रामीणों के अनुसार यहाँ भूजल भी दूषित हो चुका है। लोगों को पीने का पानी शहर से टैंकरों के जरिए मंगवाना पड़ता है।

कुम्हारी, मुरैठी और खैरखुंट भी प्यासे

पठारीडीह की तरह कुम्हारी और मुरैठी गाँव भी जल संकट से जूझ रहे हैं। नल-जल योजना की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कुम्हारी से मुरैठी तक नदी फिर जलकुंभी से ढकी दिखाई देती है।

मुर्रा गाँव पहुँचने पर जलकुंभी तो कम हो जाती है, लेकिन पानी अब भी मटमैला रहता है। ग्रामीण यहाँ भी पेयजल संकट की बात बताते हैं।

मुर्रा से लखना मार्ग पर स्थित खैरखुंट गाँव नदी से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है। यहाँ भी पानी की समस्या लोगों के लिए रोज़ की चुनौती बनी हुई है।

संगम पर साफ नदी, लेकिन पर्यटकों का कचरा

सोमनाथ पहुँचते-पहुँचते खारुन का पानी अपेक्षाकृत साफ दिखाई देता है। यहीं खारुन का संगम शिवनाथ नदी में होता है। प्राचीन सोमनाथ महादेव मंदिर धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है।

विडंबना यह है कि यहाँ दर्शन और घूमने आने वाले लोग नदी किनारे बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा छोड़ जाते हैं। मंदिर के पीछे जंगल क्षेत्र में प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट साफ दिखाई देते हैं।

अब भी नहीं चेते तो सिर्फ बरसाती नदी रह जाएगी खारुन

बालोद जिले के पेटेचुवा से निकलने वाली खारुन लगभग 90 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा और बलौदाबाजार जिलों को प्रभावित करती है। तरीघाट से सोमनाथ तक की हमारी चार दिवसीय नदी यात्रा ने एक ही सच्चाई सामने रखी—खारुन की दुर्दशा के लिए केवल सरकार नहीं, समाज भी बराबर का जिम्मेदार है।

यदि गंदे नालों को नदी में मिलने से नहीं रोका गया, औद्योगिक अपशिष्ट पर सख्ती नहीं हुई, अतिक्रमण नहीं हटे और समाज ने नदी को अपनी जिम्मेदारी नहीं माना, तो वह दिन दूर नहीं जब खारुन हमेशा के लिए अपनी पहचान खो देगी और सिर्फ बरसात के दिनों में बहने वाली एक मौसमी धारा बनकर रह जाएगी।

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