अजयारविंद नामदेव, शहडोल। कहते हैं कि मां की ममता के आगे दुनिया की हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है। शहडोल जिले से सामने आई एक तस्वीर इस बात को पूरी तरह सच साबित करती है। यह कहानी केवल एक दिव्यांग बच्चे की पढ़ाई की नहीं, बल्कि उस मां के अद्भुत हौसले की है जो अपने बेटे के सपनों को पूरा करने के लिए खुद उसकी बैसाखी बन गई है। जब बेटे के पैरों ने साथ छोड़ दिया, तो मां ने अपनी पीठ को ही उसका सहारा बना लिया।

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10 किलोमीटर का कठिन सफर और मां की पीठ का सहारा

आदिवासी बहुल शहडोल जिले के सुदूर झिक बिजुरी क्षेत्र अंतर्गत दर्शीला गांव का रहने वाला राजकुमार जायसवाल कक्षा 12वीं का छात्र है। राजकुमार शारीरिक रूप से दिव्यांग है और चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ है। उसका स्कूल शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झिक बिजुरी, घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है।

राजकुमार को रोजाना घर से बस स्टैंड तक ले जाने के लिए उसकी मां उसे अपनी पीठ पर बैठाती है। इसके बाद दोनों बस में सवार होकर स्कूल के पास उतरते हैं और बस स्टैंड से स्कूल तक का रास्ता फिर से मां की पीठ पर ही तय होता है। मौसम चाहे जैसा भी हो और रास्ता कितना भी कठिन, मां-बेटे का यह अटूट सफर हर दिन बिना रुके जारी रहता है।

सिर्फ छोड़ती नहीं, दिनभर स्कूल में रहकर करती है देखभाल

इस कहानी का सबसे भावुक करने वाला पहलू यह है कि मां अपने बेटे को सिर्फ स्कूल छोड़कर वापस घर नहीं लौटती। वह पूरे समय स्कूल परिसर में ही बैठकर दिनभर इंतजार करती है, ताकि बेटे को पढ़ाई के दौरान किसी भी तरह की परेशानी या जरूरत होने पर तत्काल मदद मिल सके। बेटे के अंदर पढ़ने की ललक और मां का यह त्याग देखकर स्कूल के शिक्षक और साथी छात्र भी दंग रह जाते हैं।

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मां की एक ही इच्छा: ‘बेटा पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो’

मां का केवल एक ही सपना है कि उसका दिव्यांग बेटा शिक्षित होकर स्वावलंबी बने और भविष्य में किसी दूसरे पर निर्भर न रहे। हालांकि रोज-रोज बेटे को पीठ पर लादकर 10 किलोमीटर का सफर तय करना शारीरिक रूप से बेहद कष्टदायक होता जा रहा है। इसी मजबूरी को देखते हुए अब परिवार और स्थानीय लोग शासन-प्रशासन से राजकुमार के लिए एक इलेक्ट्रिक ट्राई-साइकिल की मांग कर रहे हैं, जिससे मां-बेटे की यह कठिन राह कुछ आसान हो सके।

यह संघर्षगाथा समाज के लिए ममता, समर्पण और शिक्षा के प्रति अटूट निष्ठा की एक जीवंत मिसाल है, जो साबित करती है कि यदि मां का आशीर्वाद और सहारा साथ हो, तो बड़ी से बड़ी शारीरिक बाधा भी सपनों की उड़ान नहीं रोक सकती।

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