आशुतोष द्विवेदी, रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले के एक गांव से विकास के दावों की हकीकत सामने आई है। यहां आजादी के दशकों बाद भी ग्रामीणों को नदी पार करने के लिए पक्का पुल नसीब नहीं हुआ। मजबूरी ऐसी कि गांव वालों ने खुद ही लकड़ियों और बांस से पुल तैयार कर लिया। इसी जुगाड़ पुल से बच्चे स्कूल जाते हैं, महिलाएं बच्चों को गोद में लेकर गुजरती हैं और ग्रामीण अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी चलाने के लिए हर दिन मौत का जोखिम उठाते हैं।
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यह तस्वीरें रीवा जिले की जवा तहसील के रौली गांव के मुसलहा टोला की हैं। बरदाहा घाटी के नीचे बसे इस गांव के सामने वर्षों से नदी पार करने की समस्या बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से पक्का पुल बनाने की मांग की, लेकिन जब कोई समाधान नहीं निकला तो गांव वालों ने खुद ही श्रमदान कर लकड़ियों और बांस की मदद से नदी पर अस्थायी पुल तैयार कर दिया।
ग्रामीण बताते हैं कि टोंस परियोजना का पानी इसी नदी से गुजरता है। पहले बरसात में ही परेशानी होती थी, लेकिन अब पूरे साल नदी में पानी रहने से यह समस्या स्थायी बन चुकी है। यदि इस पुल का इस्तेमाल न करें तो मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए 15 से 20 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है।
गांव के हर परिवार ने लकड़ियां और बांस जुटाए, तब जाकर यह पुल तैयार हुआ। कई बार बारिश में पुल बह गया तो ग्रामीणों ने दोबारा बनाया। सुरक्षा के लिए किनारों पर लोहे की सरिया भी लगाई गई, लेकिन पुल की हालत अब बेहद जर्जर हो चुकी है। लकड़ियां कमजोर पड़ गई हैं और हर कदम पर हादसे का खतरा बना रहता है।
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इसी पुल से रोज़ स्कूली बच्चे गुजरते हैं। महिलाएं बच्चों को गोद में लेकर नदी पार करती हैं। ग्रामीण साइकिल और दोपहिया वाहन भी इसी पुल से निकालते हैं। उनका कहना है कि पुल के बीच पहुंचते ही ऐसा लगता है मानो यह कभी भी टूट जाएगा। कई बार लोगों के पैर लकड़ियों के बीच फंस चुके हैं और छोटे-बड़े हादसे भी हो चुके हैं, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि जान जोखिम में डालकर इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
एक ओर विकास और ग्रामीण संपर्क मार्गों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं रौली गांव का यह लकड़ी का पुल उन दावों की सच्चाई बयां कर रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से लेकर ग्रामीणों को कब तक एक सुरक्षित और स्थायी पुल की सौगात देता है।
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