Dharm Desk – हिंदू धर्म में अनेक यंत्रों का वर्णन मिलता है, लेकिन जब बात सर्वोच्च और सर्वशक्तिशाली यंत्र की आती है तो ‘श्री यंत्र’ को ही यंत्रों का राजा यानी ‘यंत्रराज’ कहा जाता है. यह केवल एक ज्यामितीय आकृति नहीं, बल्कि देवी शक्ति का साक्षात स्वरूप भी है. मान्यता है कि इसकी अधिष्ठात्री देवी स्वयं त्रिपुर सुंदरी हैं. जो श्रीविद्या की प्रमुख देवी है.

श्री यंत्र क्यों कहलाता है यंत्रों का राजा

शास्त्रों के अनुसार श्रीयंत्र को ‘यंत्रशिरोमणि’ कहा गया है. जैसे सभी कवचों में चंडी कवच श्रेष्ठ है. वैसे ही सभी यंत्रों में श्रीयंत्र को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. यह यंत्र त्रैलोक्य मोहन माना जाता है, अर्थात तीनों लोकों को आकर्षित करने की शक्ति रखता है. इसे सर्वसिद्धिप्रद, सर्व सौभाग्यदायक और सर्व कष्टनाशक बताया गया है.

समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है श्रीयंत्र

‘श्री यंत्र’ या ‘श्रीचक्र’ को पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना है. इसमें मौजूद रेखाएं और त्रिकोण सृष्टि के विभिन्न आयामों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ‘श्री’ शब्द का अर्थ लक्ष्मी, संपदा, शोभा और विभूति से जुड़ा है, इसलिए यह यंत्र धन, विद्या और वैभव का कारक माना जाता है.

पूजा विधि और स्थापना का महत्व

श्रीयंत्र को गंगाजल और दूध से शुद्ध करके पूजा स्थान, घर या व्यापारिक स्थल पर स्थापित किया जाता है. इसकी पूजा पूर्व दिशा की ओर मुख करके की जाती है. दीपावली, धनतेरस, बसंत पंचमी या विशेष संक्रांति के दिन इसकी स्थापना अत्यंत फल दायी मानी जाती है.

आध्यात्मिक ऊर्जा और कुंडलिनी जागरण

आध्यात्मिक दृष्टि से श्रीयंत्र को ऊर्जा का केंद्र खा गया है. यह मानव शरीर की पीनियल ग्रंथि को सक्रिय कर ऊर्जा प्रवाह को बढ़ाता है. कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने में सहायक है. साधना के माध्यम से यह व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है.

प्राण-प्रतिष्ठा से ही मिलता है पूर्ण लाभ

केवल बाजार से श्री यंत्र लाकर रखना पर्याप्त नहीं है. इसके पूर्ण प्रभाव के लिए विधिवत मंत्रोच्चार के साथ प्राणप्रतिष्ठा और अभिमंत्रण आवश्यक होता है. तभी यह यंत्र अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ कार्य करता है, और साधक को लाभ देता है.

धन, वैभव और सफलता का प्रतीक

श्री यंत्र को ‘कल्पवृक्ष’ और ‘कामधेनु’ के समान शुभ माना गया है l जो साधक की हर मनोकामना पूरी करता है. बड़े-बड़े ऋषि, योगी और व्यापारी भी इसकी महिमा को स्वीकार करते है, मान्यता है कि नियमित पूजन से अक्षय लक्ष्मी, सुख-समृद्धि और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है.