शिखिल ब्यौहार, भोपाल। मध्य प्रदेश में वन भूमि को लेकर एक नया बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। विधानसभा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने वन विकास निगम के एक कथित फैसले को लेकर प्रदेश की मोहन यादव सरकार को आड़े हाथों लिया है। सिंघार ने आरोप लगाया है कि सरकार बिगड़े वन के नाम पर लाखों हेक्टेयर वन भूमि को कॉर्पोरेट कंपनियों को सौंपने की जल्दबाजी में है जो आदिवासियों के साथ सरासर अन्याय है। उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा कि जल, जंगल और जमीन पर पहला हक इस देश के आदिवासियों का है, किसी कॉरपोरेट कंपनी का नहीं।
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4.25 लाख हेक्टेयर वन भूमि को निजी हाथों में देने की तैयारी?
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने वन विकास निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे एक बड़ी चिंता का विषय बताया है। सिंघार के मुताबिक वन विकास निगम द्वारा प्रदेश की 4.25 लाख हेक्टेयर वन भूमि को सिर्फ बिगड़े वन घोषित कर दिया गया है। अब इस विशाल भूभाग को निजी कंपनियों को सौंपने की बैकडोर से तैयारी की जा रही है। जो भूमि आदिवासियों के पशु चराने, निस्तार और उनकी आजीविका का मुख्य आधार है, उसे निजी कंपनियों को सौंपने की इतनी जल्दबाजी क्यों है?
‘मुनाफा कंपनियां खाएं, यह अन्याय स्वीकार नहीं’
उमंग सिंघार ने सरकार की नीति पर तंज कसते हुए कहा कि इस फैसले से आदिवासी अपने ही जंगलों में केवल मजदूर बनकर रह जाएंगे। उन्होंने कहा आदिवासी सिर्फ मजदूरी करें और मलाई या मुनाफा कॉरपोरेट कंपनियां खाएं, यह अन्याय किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
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राजनीतिक मायने
विधानसभा सत्र से ठीक पहले नेता प्रतिपक्ष के इस आक्रामक रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में आदिवासियों के हक और जल-जंगल-जमीन के निजीकरण का यह मुद्दा सड़क से लेकर सदन तक गूंजने वाला है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को पूरी तरह घेरने की रणनीति बना रहा है।

