लखनऊ. निषाद पार्टी के 11वें स्थापना दिवस समारोह में राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद का पूरा फोकस एक ही सवाल पर रहा, 10 साल का हिसाब कहां है? मंच से उन्होंने आरक्षण की लड़ाई से लेकर सड़क के संघर्ष, सत्ता में हिस्सेदारी और संगठन के विस्तार तक का जिक्र करते हुए विरोधियों को जवाब दिया. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि निषाद समाज के अधिकारों की लड़ाई उनके लिए चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प है.

निषाद समाज के लोगों को संबोधित करते हुए संजय निषाद ने कहा कि कुछ लोग उनसे पूछते हैं कि 10 साल से संघर्ष कर रहे हैं, फिर आरक्षण क्यों नहीं मिला? उन्होंने कहा कि सवाल पूछने वालों को पहले यह समझना चाहिए कि वह 10 साल से सरकार में नहीं हैं. साल 2022 में वह उत्तर प्रदेश सरकार में शामिल हुए. उससे पहले उनके पास सत्ता नहीं, बल्कि सड़क थी और उसी सड़क से उन्होंने समाज के अधिकारों की लड़ाई शुरू की. 2022 के बाद से उनकी लड़ाई सड़क के साथ-साथ सदन में भी जारी है.

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‘10 साल का हिसाब चाहिए तो पार्टी के 10 साल भी देखिए’

संजय निषाद ने विरोधियों से सवाल किया कि अगर उनसे 10 साल का हिसाब मांगा जा रहा है तो निषाद पार्टी के गठन से अब तक के 10 साल का पूरा सफर भी देखा जाए. उन्होंने कहा कि इन वर्षों में संगठन खड़ा किया गया, समाज को एक मंच पर लाया गया. निषाद समाज की आवाज को सड़क से सदन तक पहुंचाया गया और आरक्षण का मुद्दा लगातार राजनीतिक एजेंडे में बनाए रखा गया. उनका कहना था कि “हमारी मंजिल अभी बाकी है, लेकिन रास्ता छोड़ा नहीं है.

आरक्षण पर ‘न समझौता, न विराम’

संजय निषाद ने कहा कि लगभग 10 वर्ष पहले उन्होंने प्रण लिया था कि जब तक निषाद समाज को उसका हक, अधिकार और आरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक वह चैन से नहीं बैठेंगे. उन्होंने कहा, “मैं न बैठने वाला हूं और न आपको बैठने दूंगा. जब तक हक-हकूक की लड़ाई पूरी नहीं होगी, संघर्ष जारी रहेगा. मझवार और तुरैहा आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने दावा किया कि विधानसभा में जब भी इस विषय को उठाने का अवसर मिला, उन्होंने मजबूती से पैरवी की. उन्होंने कहा, मैं गर्व से कहता हूं कि मैं मझवार हूं और मझवार आरक्षण के लिए मरते दम तक लड़ूंगा.

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4 लोगों के दूर जाने से मुद्दा नहीं बदलेगा

पार्टी के कुछ पुराने साथियों की नाराजगी को लेकर भी संजय निषाद ने स्पष्ट संदेश दिया. उन्होंने कहा कि कुछ लोग उन्हें समाज से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों के दूर जाने से उनकी विचारधारा और संघर्ष नहीं बदलने वाला. उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल जानते हैं कि निषाद पार्टी की ताकत उसके लोग हैं, इसलिए संगठन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.

टिकट पर भी दिया 10 साल का जवाब

संजय निषाद ने पार्टी पर निषाद समाज को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं देने के आरोपों का भी जवाब दिया. उन्होंने कहा कि अतरौलिया से कन्हैया निषाद और कटहरी से संख लाल मांझी को टिकट देने के लिए वह खुद उनके घर गए थे. उनके मुताबिक दोनों ने उन्हें अपना नेता मानने से इनकार किया और टिकट स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कहा कि मैं तो टिकट देने उनके घर गया था, उन्होंने नहीं ली तो इसमें मेरी गलती क्या है?

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कसरवल से सत्ता तक का सफर

परिवारवाद के आरोपों पर संजय निषाद ने कसरवल आंदोलन का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि निषाद पार्टी के संघर्ष में उनके परिवार और कार्यकर्ताओं ने भी मुश्किलें झेली हैं. उनकी बहन मंजू के घायल होने और पत्नी की स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कसरवल आंदोलन में अनेक कार्यकर्ता जेल गए थे. उन्होंने कहा कि पार्टी के संघर्ष में योगदान देने वाले किसी व्यक्ति को वह भूले नहीं हैं और समय आने पर सभी को न्याय दिलाने का प्रयास करेंगे.

‘दस साल बीते, संकल्प नहीं बदला’

संजय निषाद ने कहा कि निषाद पार्टी के 10 साल संघर्ष के 10 साल हैं. सत्ता में हिस्सेदारी मिलने के बावजूद आरक्षण का मुद्दा उनके एजेंडे से नहीं हटा है. उन्होंने कहा कि दस साल में सरकार बदली, परिस्थितियां बदलीं, जिम्मेदारियां बदलीं, लेकिन निषाद समाज के अधिकारों के लिए मेरा संकल्प नहीं बदला.