Dharm Desk – हिंदू संस्कृति में सुहागिन महिलाओं के लिए वट पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है. इस दिन महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा को स्मरण करते हुए वट वृक्ष की पूजा करती हैं.

कब है वट पूर्णिमा
हिंदू पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि को वट पूर्णिमा मनाई जाती है. यह व्रत सोमवार, 29 जून को रखा जाएगा. पूर्णिमा तिथि की शुरु आत 29 जून को सुबह 3:07 बजे होगी और समापन 30 जून को सुबह 5:27 बजे होगा. पूजा का सबसे शुभ समय सुबह 6:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक रहेगा.
पूजा की तैयारी और आवश्यक सामग्री
व्रत करने वाली महिलाएं पूजा से पहले हल्दी कुमकुम, अक्षत, फूल, सफेद सूत का धागा, पांच प्रकार के फल, पान-सुपारी, नारियल, गुड, धूप, दीप और कपूर की व्यवस्था करती हैं. इसके अलावा वाण देने के लिए बांस की सुपारी में चने और फल रखे जाते हैं.
पूजा विधि क्या है?
सुबह स्नान के बाद महिलाएं पारंपरिक साड़ी, हरी चूड़ियां पहनकर तैयार होती हैं. इसके बाद वट वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में हळद-कुंकू, अक्षत और फूल अर्पित किए जाते हैं. सावित्री-सत्यवान का स्मरण करते हुए फल और पान-सुपारी चढ़ाई जाती है. इसके बाद वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए सफेद धागा लपेटा जाता है. शास्त्रों के अनुसार कम से कम 7 या 108 फेरे लगाने का विधान है. अंत में आरती कर व्रत पूर्ण किया जाता है और अन्य सुहागिन महिलाओं को ‘वाण’ देकर सौभाग्य का आशीर्वाद दिया जाता है.
वट पूर्णिमा की प्रार्थना
इस दिन महिलाएं सावित्री देवी से प्रार्थना करती हैं. हे देवी! मुझे अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि प्रदान करें. यदि संस्कृत श्लोक न आता हो तो सरल भाषा में भी यही भावना व्यक्त की जा सकती है. यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को भी मजबूत करता है.

