रेणु अग्रवाल, धार। बहुचर्चित भोजशाला मामले में बड़ा अपडेट सामने आया है। धार जिले के भोजशाला मामले में 98 दिन तक ASI की टीम ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। 3D स्कैनिंग, ग्राउंड पेनिट्रेटिंग, रडार फोटोग्रामेंट्री, स्थापत्य का अध्ययन किया गया था। कोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट के तथ्य सामने आए हैं। जिसमें कई बड़े खुलासे हुए है! आइए जानते है इस रिपोर्ट में क्या-क्या है..?
संस्कृत, अरबी और फारसी शिलालेख
भोजशाला परिसर में वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान 10वीं-11वीं शताब्दी की नीव मिली। जमीन के नीचे बड़े चबूतरे दीवार के आधार स्तंभ के अवशेष मिलने का उल्लेख है। बेसाल्ट संरचना पर कई शिलालेख खुदे हुए थे। जिसमें शारदा सदन और साहित्यिक कृति परिजात मंजरी का उल्लेख मिलता है। 150 से अधिक संस्कृत प्राकृत शिलालेख और उनके खंड मिले। 56 अरबी और फारसी शिलालेख दर्ज किए गए हैं।

शिलालेखों को लगाते समय अक्षरों को घिसा गया
जांच के दौरान बेसाल्ट संगमरमर शीस्ट जैसी सामग्रियों से बनी 94 मूर्तियां और उनके अवशेष मिले। स्तंभों पर नाग बंध शिलालेख मौजूद है। इस स्थल का निर्माण तीन चरणों में हुआ। वर्तमान मस्जिद जैसी दिखने वाली संरचना तीसरे चरण की है। इस स्थल का निर्माण तीसरे चरण का है, पहले से मौजूद क्षतिग्रस्त मंदिर संरचना के ऊपर बनाया गया है। कई शिलालेखों को फर्श और दीवारों में लगाते समय उनके अक्षरों को घिसा गया है, उन्हें उल्टा लगाया गया है। दीवारों पर प्राचीन चित्र का रहस्य मिला।
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आकृतियों को तराशा और मिटाया
स्तंभों भी पर नक्काशीदार चार भुजाओं वाली देवता और इंसानी आकृतियों को तराशा, मिटाया गया। चारभुजा वाले देवता गणेश ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव की मूर्तिया खंडित अवस्था में मिली। कुछ फ्रेम पर देवताओं की छोटी आकृतियां अच्छी स्थिति में पाई गई। दीवारों व खंभों पर 139 से अधिक प्रकार के चिन्ह त्रिशूल, स्वास्तिक, चक्र देवनागरी अक्षर मिले। उत्तर पश्चिम की दीवार पर एक पेंटिंग मिली जो काले रंग की है। जिसमें छह आकृति वाला युद्ध का दृश्य दिखाया गया। जिसमें सैनिकों के दो समूह आपस में लड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। सैनिक ने हाथ में भला और ध्वज दंड थाम रखा है।

किया जा रहा ये दावा
12वीं से 20 वीं सदी के शिलालेखों के प्रमाण। प्राकृत, संस्कृत के साथ अरबी फारसी के लेख मिले। वहीं भोजशाला मंदिर के समीप ही कमाल मौला परिसर में हुई जांच में 12वीं से 20वीं सदी के बीच के अनेक शिलालेख सामने आए हैं। जिसमें अरबी और फारसी शिलालेख दर्ज किए गए हैं। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह परिसर मूल रूप से राजा भोज के दौरान स्थापित शारदा सदन सरस्वती मंदिर और शिक्षा का केंद्र था।
मस्जिद है, और रहेगी…
कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी मुस्लिम समाज सदर अब्दुल समद ने कहा कि सर्वे रिपोर्ट में सर्वे वालों ने साफ बात लिखी है। मौजूदा स्ट्रक्चर मस्जिद का स्वरूप है। मस्जिद है लेकिन उन्होंने एक चीज यह भी लिखी है जो चीज अंदर से निकली है जो आकृतियां हैं हो सकता हो यहां पर कोई बिल्डिंग रही हो। उसकी चीजे निकली है लेकिन हमने हमारी पिटीशन में सुब्रमण्यम स्वामी जी ने जो पीटीशन लंदन कोर्ट में लगाई थी, उसके हवाले से पूरा इतिहास कोर्ट के सामने पहले ही रख दिया था। वह जो मस्जिद निर्माण है, बाबा कमालुद्दीन धार आए थे। उस सदी में हुआ था उनके द्वारा किया गया था जो कोई पुराने बिल्डिंग मटेरियल को इस्तेमाल कर किया गया था। वह सारी चीज सर्वे रिपोर्ट में मैच अप हो रही है। यही हमारा आधार बनता है कि वह मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।
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हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के याचिकाकर्ता ने कही ये बात
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने बताया कि लगभग 8190 पेज की विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय को प्रस्तुत की जा चुकी है। रिकॉर्ड पर ली जा चुकी है। हमें भी रिपोर्ट मिल चुकी है। इस स्ट्रक्चर की आयु 950 से 1000 है। शिलालेख पारिजात मंजरी नाटक जो की स्तंभों पर अंकित है, जिसके रचयिता मदन परमार कालीन माने जाते हैं। स्तंभों पर अंकित साहित्य कविताएं अलंकरण सर्वे में 98 मूर्तियां सहित 1700 अवशेष मिलने का दावा किया। जिन्हें हिंदू संस्कृति से जुड़ा बताया। खुदाई में भवन की संरचना के अवशेष मिले। देवी देवता मानव पशु आकृतियां को विकृत किए जाने के संकेत मिले।
यह मंदिर है और इसे हिंदुओं ने बनाया है- आशीष गोयल
उन्होंने आगे बताया कि कई शिलालेख मिले जिससे स्पष्ट होता है कि यह राजा भोज के द्वारा निर्मित सरस्वती सदन था। मुख्य इमारत का निर्माण लगभग 950 ई के आसपास का होना बताया गया। इस कालखंड में मालवा क्षेत्र में इस्लाम का आगमन नहीं हुआ था। आशीष गोयल ने कहा कि कमाल मौलाना का प्रवेश ही 1265 में हुआ। इस्लाम का प्रवेश 1300 से 1400 में हुआ है। 950 में कोई स्ट्रक्चर बना हुआ है तो वह हिंदुओं का ही होगा। उन्होंने कहा कि हम तो बार-बार कह रहे हैं कि यह मंदिर है और इसे हिंदुओं ने बनाया है और यह परमार कालीन हैं।

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