यमुना नदी में कालिंदी कुंज और मदनपुर खादर के आसपास इन दिनों गुलाबी रंग की झाग दिखाई दे रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे गंभीर प्रदूषण का संकेत मान रहे हैं। आम तौर पर नदी में बनने वाली झाग सफेद होती है, लेकिन इस बार गुलाबी झाग का रंग औद्योगिक प्रदूषण की आशंका बढ़ा रहा है। पिछले करीब दस दिनों से नदी की सतह पर दूर-दूर तक यह झाग तैरती नजर आ रही है, जिससे जल और आसपास के पर्यावरण पर असर होने की संभावना है।

क्यो गुलाबी हुआ झाग

पर्यावरणविदों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में झाग का सफेद रंग घरेलू डिटर्जेंट या जैविक पदार्थों के सड़ने के कारण बनता है। लेकिन इस बार झाग का गुलाबी रंग होने के पीछे औद्योगिक प्रदूषण मुख्य कारण माना जा रहा है। पानी में कपड़ों की रंगाई में इस्तेमाल होने वाले डाई केमिकल और अन्य औद्योगिक अपशिष्ट की मात्रा बढ़ने से झाग का रंग गुलाबी हो जाता है। यह संकेत देता है कि नदी में बिना उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ा जा रहा है। घरेलू सीवेज और उद्योगों से निकलने वाले डिटर्जेंट में फॉस्फेट की मात्रा अधिक होती है। फॉस्फेट पानी में घुली ऑक्सीजन को कम कर देता है, जिससे जलीय जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जब प्रदूषित पानी किसी बैराज या ऊंचाई से गिरता है, तो उसमें मौजूद रसायन झाग का रूप ले लेते हैं और रंग बदल सकता है।

कितना खतरनाक गुलाबी झाग

रिपोर्ट के मुताबिक, यमुना नदी में दिख रही गुलाबी झाग मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकती है। इसके सीधे संपर्क में आने से त्वचा की समस्याएं और सांस से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। पानी में ऑक्सीजन की कमी के कारण मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मौत का खतरा बढ़ जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि गुलाबी झाग सफेद झाग की तुलना में अधिक जहरीली मानी जाती है क्योंकि इसका संबंध सीधे औद्योगिक अपशिष्ट और डाई केमिकल से होता है। समस्या से निपटने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को मजबूत और आधुनिक बनाना जरूरी है, ताकि औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट का प्रभाव कम किया जा सके।

झाग को नियंत्रित करने के लिए किया गया था रसायनों का छिड़काव

पिछले साल राजधानी दिल्ली सरकार ने यमुना नदी में झाग को नियंत्रित करने के लिए रसायनों का छिड़काव कराया था, लेकिन यह उपाय स्थायी समाधान साबित नहीं हुआ। दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार, वर्ष 2025 में छठ पूजा से पहले और उसके बाद दिसंबर तक झाग को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर रसायनों का छिड़काव किया गया था। लगभग 46 टन केमिकल का इस्तेमाल किया गया, जिस पर करीब 79.62 लाख रुपये खर्च हुए। यह अभियान 15 अक्टूबर से 16 दिसंबर तक चला। हालांकि इससे झाग को अस्थायी तौर पर कम किया गया, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। विशेषज्ञों का कहना है कि अब जरूरत है कि सरकार एक व्यापक योजना बनाए, जिससे दिल्ली और हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाले बिना उपचारित पानी को यमुना में जाने से रोका जा सके।

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