Chaitra Navratri 2026. नवरात्र में भगवती मां दुर्गा के विभिन्न स्वरुपों की पूजा की जाती है. ये 9 रातें भगवती की विशेष आराधना के लिए होती हैं. जिसमें जगदम्बा की अर्चना की जाती है. उत्तर प्रदेश में कई ऐसी मंदिर हैं, शक्तिपीठ हैं जिनकी अनूठी मान्यताएं और विशेष महत्व है. ऐसा ही एक प्रसिद्ध मंदिर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में स्थित है. ये मंदिर मां विंध्यवासिनी को समर्पित है. गंगा नदी के किनारे पर स्थित इस मंदिर में मां जागृत अवस्था में विराजित हैं. ये मंदिर 51 शक्तीपीठों में से एक है.

मान्यता है कि यहां स्थापित देवी की आराधना सृष्टि के आरंभ के पहले से हो रही है. भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जब कंस के कारागृह में मां देवकी और वासुदेव के यहां जन्म लिया तब नंदबाबा और मां यशोदा के यहां एक कन्या का भी जन्म हुआ था. उनको वासुदेव ने आपस में बदल लिया. जब कंस ने कन्या को मारने की कोशिश की तो वह देवी योगमाया के रूप में बदल गईं. माता ने कंस से कहा कि जो तुझे मारेगा उसने तो जन्म ले लिया है और सुरक्षित है. इतना कहकर देवी विंध्याचल पर्वत पर निवास करने के लिए चली गईं.
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श्रीमद् देवी भागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुव मनु और शतरूपा को उत्पन्न किया तब विवाह करने के बाद स्वायम्भुव मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया. उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि और परम पद पाने का आशीर्वाद दिया. वर देने के बाद महादेवी विंध्याचल पर्वत पर चली गईं. इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही भगवती विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है. सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीष से हुआ है. ये ब्रह्मांड का प्रथम दिव्य स्वयंभू तीर्थ है.

इन देवियों के दर्शन के बिना यात्रा अधूरी
भगवती के अन्य नाम भी हैं. इन्हें योगमाया, विंध्यवासिनी, महामाया और एकानंशा के नाम से भी जाना जाता है. वैष्णव परंपरा में इन्हें नारायणी की संज्ञा दी गई है और वह विष्णु की माया शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं. तो वहीं शाक्त इन्हें आदि शक्ति का रूप मानते हैं. यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं. इन तीनों के दर्शन के बिना विंध्याचल की यात्री अधूरी मानी जाती है. तीनों के केंद्र में मां विंध्यवासिनी विराजित हैं.
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कहा जाता है कि महाभारत के पहले भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को यहां युद्ध में विजय का आशीर्वाद मांगने के लिए लेकर आए थे. जहां युधिष्ठिर और अर्जुन ने स्व रचित स्तोत्र ‘निशुम्भ शुम्भ गर्जनी, प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी। वनेरणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी’ से उनकी स्तुति की थी जो आज भी प्रचलित है. जिसे विंध्यवासिनी स्तोत्र के नाम से जाना जाता है. इस महाशक्तिपीठ में वैदिक और वाम मार्ग दोनों विधि से भगवती का पूजन होता है.

पताका में निवास करतीं हैं देवी
ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि में मां विंध्यवासिनी मंदिर की पताका में निवास करती हैं. ताकि किसी वजह से मंदिर ना पहुंच पाने वाले श्रद्धालु भी पताका देखकर ही सुक्ष्म रुप से दर्शन पा सकें. सोने के इस झंडे को सूर्य-चंद्र पताकिनी के नाम से जाना जाता है. जिसका निशान केवल देवी विंध्यवासिनी के मंदिर में ही मिलता है. पुराणों में विंध्याचल को तपोभूमि कहा गया है. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी मां यहां पर मधु-कैटभ नाम के राक्षसों का वध करने के लिए अवतरित हुई थीं. वहीं श्रीमद्भागवत पुराण में इन्हें नंदजा यानी नंद बाबा की पुत्री बताया गया है. अन्य शास्त्रों में मां का कृष्णानुजा और वनदुर्गा नाम भी मिलता है.
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