AI Data Centres Heat Island Effect : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर्स की वजह से तापमान बढ़ रहा है. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा की गई रिसर्च बताती है कि जिन इलाकों में ये डेटा सेंटर्स काम करते हैं, वहाँ औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है. वैज्ञानिकों ने इस घटना को ‘डेटा हीट आइलैंड इफेक्ट’ नाम दिया है.

डेटा सेंटर्स के 10 किलोमीटर के दायरे में बढ़ती है गर्मी
रिसर्चर्स ने पिछले दो दशकों के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया. उनके नतीजों से पता चला कि जैसे ही किसी खास इलाके में कोई AI डेटा सेंटर चालू होता है, वहां का स्थानीय तापमान अचानक बढ़ जाता है. डेटा सेंटर्स के आस-पास के इलाकों में तापमान औसतन 2.07 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. कुछ खास जगहों पर तापमान में 9.1 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसका असर सिर्फ़ डेटा सेंटर्स की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं है; बल्कि सेंटर से 10 किलोमीटर के दायरे तक तापमान में बढ़ोतरी देखी जा रही है.
रिसर्च की 4 मुख्य बातें…
डेटा हीट आइलैंड इफेक्ट
अब तक, ‘अर्बन हीट आइलैंड’ की अवधारणा पर ही मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता था. यह एक ऐसी घटना है जिसमें कंक्रीट के जंगलों और बढ़ती आबादी के कारण शहरों का तापमान गांवों के मुकाबले 4 से 6 डिग्री ज्यादा रहता है.
अब, AI इंफ्रास्ट्रक्चर भी इसी श्रेणी में शामिल हो गया है. AI सेवाएं देने के लिए भारी मात्रा में बिजली और कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है. इस प्रक्रिया से निकलने वाली गर्मी सीधे तौर पर स्थानीय पर्यावरण पर असर डाल रही है.
डेटा हीट आइलैंड इफेक्ट क्या है?
यह एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें AI डेटा सेंटर्स से निकलने वाली अत्यधिक गर्मी आस-पास के स्थानीय पर्यावरण का तापमान बढ़ा देती है. AI मॉडल्स को चलाने के लिए जरूरी शक्तिशाली सर्वर्स और कूलिंग सिस्टम लगातार गर्म हवा बाहर निकालते रहते हैं—दिन के 24 घंटे, हफ्ते के सातों दिन जिससे शहरी इलाकों के भीतर ‘हीट आइलैंड्स’ बन जाते हैं.
इससे न सिर्फ़ स्थानीय तापमान बढ़ता है, बल्कि इन AI सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए ज़रूरी पानी और बिजली की खपत में भी भारी बढ़ोतरी होती है. सीधे शब्दों में कहें तो, यह डिजिटल क्रांति के कारण पैदा होने वाले पर्यावरणीय तापीय प्रदूषण का एक नया रूप है. 2. 34 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य पर असर
एक स्टडी के मुताबिक, दुनिया भर में लगभग 34.4 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां इन डेटा सेंटर्स से निकलने वाली गर्मी का असर पड़ता है. हालांकि कई डेटा सेंटर शहरी केंद्रों से काफी दूर बनाए जाते हैं, फिर भी उनका असर बड़े पैमाने पर महसूस किया जा रहा है.
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इसका न केवल इंसानी सेहत पर बुरा असर पड़ेगा, बल्कि इससे बिजली की खपत भी बढ़ेगी. नतीजतन, घरों को ठंडा रखने से जुड़ी लागत भी बढ़ जाएगी.
स्पेन, मेक्सिको और ब्राज़ील में किए गए अध्ययन
शोधकर्ताओं ने स्पेन के आरागॉन क्षेत्र, मेक्सिको के बाजियो क्षेत्र और ब्राजील के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में केस स्टडी कीं. इन इलाकों में डेटा सेंटरों के समूह मौजूद हैं. इन जगहों पर तापमान में असामान्य बढ़ोतरी देखी गई है; गर्मी के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में भी तेजी से उछाल आया है.
आसन्न खतरा: भारी बिजली की खपत
शोधकर्ताओं के अनुसार, अगले एक दशक के भीतर, डेटा सेंटर क्षेत्र दुनिया के सबसे ज़्यादा बिजली की खपत करने वाले क्षेत्रों में से एक बनने का अनुमान है. उनके कंप्यूटिंग कार्यों को चलाने के लिए जरूरी बिजली की मात्रा जल्द ही विनिर्माण क्षेत्र के कुल ऊर्जा बजट से भी ज्यादा होने की उम्मीद है.
खास चिंता की बात यह है कि ज्यादातर AI इंफ्रास्ट्रक्चर जीवाश्म ईंधन जैसे पेट्रोल, डीज़ल, कोयला और प्राकृतिक गैस से पैदा होने वाली बिजली पर निर्भर करता है. यह निर्भरता गर्मी पैदा होने और पर्यावरण प्रदूषण, दोनों को और बढ़ा रही है.
भारत के इन शहरों में हैं AI डेटा सेंटर?
तेजी से बदलती दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि भविष्य की रीढ़ बन चुका है. भारत भी इस डिजिटल दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और इसी का सबसे बड़ा उदाहरण हैं देशभर में बन रहे AI डेटा सेंटर. ये डेटा सेंटर सिर्फ मशीनों का जाल नहीं, बल्कि वो दिमाग हैं जो करोड़ों यूजर्स के डेटा को प्रोसेस करके AI को ताकत देते हैं.
भारत में AI डेटा सेंटर तेजी से विकसित हो रहे हैं, जिनमें प्रमुख शहर हैं नोएडा, जामनगर, नवी मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, विशाखापट्टनम और चेन्नई, जो देश के उभरते डिजिटल और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रमुख हब बनते जा रहे हैं.
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