औरंगाबाद। जिले ने देश की सुरक्षा के लिए अपना एक और वीर सपूत खो दिया है। झारखंड के सारंडा जंगलों में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान शहीद हुए CRPF की 210 कोबरा बटालियन के जवान राकेश कुमार का पार्थिव शरीर गुरुवार को उनके पैतृक गांव पहुंचा। इस दौरान पूरे इलाके में गम और गर्व का मिला-जुला माहौल देखने को मिला।
तीन मासूमों ने दी मुखाग्नि
शहीद राकेश कुमार का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया गया। सबसे भावुक पल तब आया जब शहीद की 8 वर्षीय बेटी प्रियंका, 6 वर्षीय रिया और 4 वर्षीय बेटे हिमांशु ने अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी। अपनी पत्नी के पार्थिव शरीर से लिपटकर रोती पत्नी पिंकी देवी और अपने पिता को एकटक निहारते मासूम बच्चों को देख वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गईं। ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, राकेश तेरा नाम रहेगा’ के नारों से पूरा आसमान गूंज उठा।
मौत के कारणों पर गहराया विवाद
जवान की शहादत को लेकर विभाग और परिजनों के बयानों में भारी विरोधाभास नजर आ रहा है। आधिकारिक तौर पर परिजनों को बताया गया कि चाईबासा के सारंडा जंगल में आंधी-तूफान के कारण एक पेड़ गिरने से राकेश घायल हो गए थे और अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई।
हालांकि, शहीद के भाई विक्रम और अन्य परिजनों ने इस थ्योरी को खारिज कर दिया है। उनका दावा है कि राकेश के शरीर पर पेड़ गिरने जैसी चोट के निशान नहीं थे, बल्कि सिर पर एक गहरा सुराख था जो गोली लगने का संकेत देता है। परिजनों का आरोप है कि सच्चाई को छिपाने की कोशिश की जा रही है।
नक्सलियों के काल थे राकेश
राकेश कुमार एक जांबाज योद्धा थे। 2012 में CRPF जॉइन करने वाले राकेश ने हाल ही में तीन नक्सलियों को ढेर किया था, जिसके लिए उन्हें सम्मानित कर प्रमोट भी किया गया था। वे 5 मार्च को ही छुट्टी बिताकर ड्यूटी पर लौटे थे। पूर्व विधायक रणविजय सिंह सहित अन्य स्थानीय नेताओं ने भी इसे नक्सली हमला करार देते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। शहीद अपने पीछे चार भाइयों का भरा-पूरा परिवार और तीन बच्चों को छोड़ गए हैं, जिनकी परवरिश की जिम्मेदारी अब समाज और सरकार पर है।
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