प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने महिलाओं के लिए राज्यों में चल रही प्रत्यक्ष नकद सहायता (Direct Benefit Transfer) योजनाओं को लेकर महत्वपूर्ण सिफारिश की है। परिषद का कहना है कि महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत और परिवारों के बदलते खर्च को देखते हुए इन योजनाओं की सहायता राशि की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर लाभार्थियों को मिलने वाली राशि में बढ़ोतरी भी की जाए।
माझी लाडकी बहिन और सुभद्रा योजना का अध्ययन
ईएसी-पीएम ने अपनी रिपोर्ट में महाराष्ट्र की ‘माझी लाडकी बहिन योजना’ और ओडिशा की ‘सुभद्रा योजना’ का विस्तृत अध्ययन किया। रिपोर्ट के अनुसार, इन योजनाओं से महिलाओं की बचत बढ़ी है, घरेलू खर्च का बोझ कम हुआ है और परिवारों की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक सुधार देखने को मिला है।
डिजिटल साक्षरता और कौशल विकास पर जोर
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि केवल नकद सहायता देना पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास कार्यक्रमों और स्वयं सहायता समूह (SHG) से भी जोड़ा जाना चाहिए। इससे वे आत्मनिर्भर बनेंगी और उनकी आर्थिक भागीदारी में दीर्घकालिक वृद्धि होगी।
कैश ट्रांसफर से बढ़ा UPI का इस्तेमाल
ईएसी-पीएम के अनुसार, नकद सहायता मिलने के बाद महिलाओं में UPI के जरिए डिजिटल भुगतान का उपयोग तेजी से बढ़ा है। महिलाएं अब शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवनशैली से जुड़ी जरूरतों पर पहले की तुलना में अधिक खर्च कर रही हैं, जिससे वित्तीय समावेशन को भी बढ़ावा मिला है।
15 से अधिक राज्यों में 12 करोड़ महिलाओं को लाभ
रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 15 से अधिक राज्यों में महिलाओं के बैंक खातों में सीधे नकद सहायता भेजी जा रही है। इन योजनाओं का लाभ करीब 12 करोड़ महिलाओं को मिल रहा है। परिषद का मानना है कि महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देने से न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, बल्कि महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी भी बढ़ती है। इसलिए सहायता राशि को महंगाई के अनुरूप समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।
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