कभी नौसेना में डॉक्टर के तौर पर लोगों की जिंदगी बचाने वाले 70 वर्षीय अरविंद नाथ पाठक का अंतिम दौर बेहद अकेलेपन में बीता। कालकाजी के एन ब्लॉक में रहने वाले अरविंद की मौत के बाद पुलिस ने अमेरिका में रह रही उनकी पत्नी और बेटे को सूचना दी, लेकिन दोनों अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली नहीं पहुंच सके। परिवार के इस फैसले ने अकेलेपन और बुजुर्गों से जुड़ी एक गंभीर तस्वीर सामने रख दी है।
अरविंद ने नौसेना में डॉक्टर के रूप में सेवाएं दी थीं। बाद में उन्होंने कालकाजी में अपना क्लिनिक भी शुरू किया। पुलिस के मुताबिक, जिंदगी के बाद के वर्षों में वह नशे की लत के शिकार हो गए थे। धीरे-धीरे उनका परिवार से संपर्क कम होता गया। उनकी पत्नी और बेटा अमेरिका चले गए, जबकि अरविंद दिल्ली में अकेले रहने लगे।
अरविंद को डायबिटीज समेत कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी थीं। उनके भाई महेंद्र समय-समय पर उनसे मिलने और उनकी देखभाल के लिए आते थे। परिवार से दूरी बढ़ने के बावजूद भाई का साथ उनके लिए सहारा बना हुआ था।
लापता होने के बाद पुलिस ने शुरू की तलाश
12 अगस्त को अरविंद के भाई महेंद्र ने कालकाजी थाने में उनके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने तलाश शुरू की। अगले दिन शाम को अरविंद अपने इलाके में ही एक कूड़े के ढेर के पास अचेत अवस्था में मिले। पुलिस उन्हें अस्पताल लेकर पहुंची, लेकिन चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद पुलिस ने उनके परिवार से संपर्क करने की कोशिश की। अमेरिका में रह रही पत्नी और बेटे को अरविंद की मौत की जानकारी दी गई। पुलिस के मुताबिक, बेटे ने ई-मेल के जरिए शव उनके चाचा और चचेरे भाई को सौंपने की बात कही।
पुलिस ने परिवार के सदस्यों से अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली आने का आग्रह भी किया, लेकिन वे भारत आने में असमर्थता जताते रहे। बाद में पोस्टमॉर्टम से जुड़ी जानकारी लेने के अलावा परिवार की ओर से कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं मिली।
सोनीपत के व्यापारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही
कुछ दिन पहले हरियाणा के सोनीपत से भी बुजुर्ग पिता की ऐसी ही दर्दनाक कहानी सामने आई थी। यहां एक कपड़ा व्यापारी अपने जीवन के आखिरी समय में बेटियों से मिलने की उम्मीद लगाए रहे, लेकिन कथित तौर पर बेटियों ने उनसे मुलाकात नहीं की।
व्यापारी की मौत के बाद भी उनकी बेटियां अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंचीं। बताया गया कि एक बेटी ने वीडियो कॉल के जरिए अंतिम संस्कार देखा, जबकि दूसरी बेटी ने 5100 रुपये भेजे। इन दोनों घटनाओं ने परिवार से दूर होते बुजुर्गों के अकेलेपन और उनके भावनात्मक सहारे की जरूरत पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अरविंद पाठक की कहानी भी यही सोचने पर मजबूर करती है कि जिंदगी में चाहे कितनी भी उपलब्धियां हासिल हों, उम्र के आखिरी पड़ाव में अपनों का साथ और अपनापन सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है।
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