पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के प्रशासनिक कामकाज में बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने का बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को घोषणा करते हुए कहा कि 1 सितंबर 2026 से राज्य सरकार के सभी विभागों में सरकारी कार्य बंगाली भाषा में किए जाएंगे। हालांकि, केंद्र सरकार के साथ आधिकारिक संवाद के लिए हिंदी का भी उपयोग जारी रहेगा।
इन सेवाओं में बंगाली भाषा होगी अनिवार्य
मुख्यमंत्री के अनुसार, यह व्यवस्था नागरिक सेवाओं, डिजिटल गवर्नेंस सिस्टम, आवेदन पत्र, प्रमाणपत्र, पोर्टल, सरकारी वेबसाइट, मोबाइल एप्लिकेशन, प्रशिक्षण सामग्री, सार्वजनिक साइनबोर्ड, प्रेस विज्ञप्ति, नोटिफिकेशन, हलफनामों, नागरिक चार्टर और एफआईआर समेत सभी सरकारी संचार माध्यमों पर लागू होगी। भूमि एवं भूमि सुधार विभाग से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक सभी विभागों में बंगाली भाषा का इस्तेमाल अनिवार्य रहेगा।
एक सप्ताह में देनी होगी अनुपालन रिपोर्ट
मुख्यमंत्री ने बताया कि सभी मंत्री और विधायक इस संबंध में एक सप्ताह के भीतर पत्रों का जवाब देंगे और अनुपालन रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी जाएगी। उन्होंने कहा कि वे स्वयं भी एक सप्ताह के भीतर इस फैसले के क्रियान्वयन की रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।
2011 में गठित आयोग की रिपोर्ट लागू
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह निर्णय वर्ष 2011 में तत्कालीन टीएमसी सरकार द्वारा न्यायमूर्ति सुशांत चटर्जी की अध्यक्षता में गठित आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है। सोमवार को उसी रिपोर्ट को सार्वजनिक करते हुए सरकार ने इसे लागू करने की घोषणा की।
अमित शाह के पत्र का किया उल्लेख
मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रशासन में बंगाली भाषा के व्यापक उपयोग का सुझाव देते हुए उन्हें पत्र लिखा था। विधानसभा में पत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, विकास और प्रशासनिक उपयोग के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि लोकतांत्रिक शासन तभी प्रभावी और जन-केंद्रित बन सकता है, जब प्रशासन लोगों की मातृभाषा में संचालित हो।
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