अभय मिश्रा, ​मऊगंज। सबके लिए बेहतर स्वास्थ्य के सरकारी दावों की पोल खोलती एक शर्मनाक तस्वीर मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के सिविल अस्पताल से सामने आई है। यहां सरकारी अस्पताल की बदहाली का आलम यह है कि शनिवार को इलाज कराने पहुंचे 518 मरीजों को न तो डॉक्टर मिले और न ही इमरजेंसी सेवाएं। ओपीडी के तय समय के दौरान डॉक्टर अपनी कुर्सियों से नदारद रहे, वहीं जीवनरक्षक ‘इमरजेंसी वार्ड’ के दरवाजे पर भारी-भरकम ताला लटका मिला। दूर-दराज से आए गरीब मरीज और दर्द से तड़पती महिलाएं अस्पताल परिसर में भटकने को मजबूर रहीं।

​ओपीडी का समय शाम 5 से 6 बजे का था, लेकिन एक भी डॉक्टर अपनी कुर्सी पर मौजूद नहीं था। हद तो तब हो गई जब जीवन रक्षक कहे जाने वाले ‘इमरजेंसी वार्ड’ के दरवाजे पर भी भारी-भरकम ताला लटका मिला। गरीब, मजदूर और दूर-दराज से आए मरीज तड़पते रहे, लेकिन अस्पताल के कमरों से डॉक्टर नदारद रहे। सवाल यह है कि जब आपातकालीन स्थिति में भी दरवाजे बंद मिलेंगे, तो मरीज आखिर जाएं तो जाएं कहां?

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​फार्मासिस्ट गायब, बाहरी अनजान शख्स बांट रहा था मरीजों को दवाइयां

लापरवाही की सीमा यहीं खत्म नहीं होती। अस्पताल के फार्मेसी काउंटर से आधिकारिक फार्मासिस्ट गायब था और उसकी जगह एक बाहरी अज्ञात एवं अप्रशिक्षित व्यक्ति मरीजों को दवाइयां बांट रहा था। मरीजों को गलत दवाइयां थमाई जा रही थीं। जब कैमरे के सामने उससे सवाल किया गया, तो उसने बड़ी बेबाकी से कहा कि फार्मासिस्ट बाहर गए हैं, इसलिए मैं दवा दे रहा हूं। अगर गलत दवा से किसी मरीज की जान चली जाए, तो इस गैर-कानूनी खेल का जिम्मेदार कौन होगा?

गायनी विभाग का हाल बेहाल, घर पर सेवाएं दे रहे डॉक्टर

दूसरी तरफ, गायनी (महिला रोग) विभाग का हाल और भी बदतर दिखा। इलाज के लिए भटक रही महिलाओं को देखने वाला कोई नहीं था। रीवा में हाल ही में हुई जच्चा-बच्चा की मौत के बाद भी मऊगंज अस्पताल प्रशासन ने कोई सबक नहीं सीखा। गायनी विभाग का प्रभार संभाल रहे डॉक्टर प्रद्युम्न शुक्ला जिन पर पहले भी कई गंभीर आरोप लग चुके हैं अस्पताल में ड्यूटी देने के बजाय अपने घर पर सेवाएं देने में मस्त हैं, जबकि गरीब महिलाएं दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

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BMO ने जताई लाचारी

पूरे मामले पर जब ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने भी अपनी लाचारी जाहिर कर दी। बीएमओ का कहना है कि डॉक्टर अपने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, सुबह से वे खुद अकेले सेवाएं दे रहे हैं। नोटिस देने के बावजूद कोई डॉक्टर काम पर लौटने को तैयार नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तनख्वाह लेने वाले ये डॉक्टर सिर्फ अपने प्राइवेट क्लीनिक चलाने और मरीजों की जेब काटने के लिए अस्पताल में पदस्थ हैं?

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