Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

केदार के नाम रिकॉर्ड

छत्तीसगढ़ के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मंत्री रहने का रिकॉर्ड केदार कश्यप के नाम दर्ज हो चुका है। बस्तर की धरती से निकली उनकी सियासी गाड़ी सरकार बदलने और हर लहर के थपेड़े झेलने के बावजूद बेधड़क दौड़ती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तीनों कार्यकाल में वे लगातार 15 साल मंत्री रहे और अब साय सरकार में चौथी बार ढाई साल से मंत्रालय संभाल रहे हैं। जोड़ लें तो आंकड़ा 17 साल 9 महीने का बैठता है। केदार कश्यप ने जो बेंचमार्क सेट किया है, वहां तक पहुंचना किसी भी सियासी धुरंधर के लिए आसान तो कतई नहीं है। इस बेंचमार्क को बनाने के लिए सिर्फ चुनाव जीतना ही काफी नहीं है, लगातार ढाई दशक तक ‘जरूरी’ बने रहना भी पड़ता है। केदार कश्यप का यह सफर बदस्तूर जारी है। रिकॉर्ड की इस दौड़ में उनके ठीक पीछे बृजमोहन अग्रवाल हैं। रमन सरकार में पूरे 15 साल सत्ता के सबसे मजबूत पायो में से एक रहे बृजमोहन साय सरकार में भी करीब 6 महीने मंत्री रहे। रायपुर के सांसद बनने के बाद उनकी मंत्री पद की पारी थमी। बृजमोहन करीब 15 साल 6 महीने सूबे में मंत्री रहे। रमन राज की तिकड़ी में अमर अग्रवाल और राजेश मूणत की जोड़ी ने भी अपनी जगह पक्की रखी। दोनों 15-15 साल मंत्री रहे। रामविचार नेताम का नंबर इसके बाद आता है। रमन सरकार के दो कार्यकाल के 10 साल और अब साय सरकार का मौजूदा समय जोड़ लें तो वे 12 साल 9 महीने तक सूबे में मंत्री रह चुके हैं। उनकी गाड़ी अब भी सरपट भाग रही है। आक्रामक तेवर के लिए मशहूर अजय चंद्राकर, विक्रम उसेंडी और जमीन से जुड़े पुन्नूलाल मोहिले का नाम भी 10 साल मंत्री रहने वाले लोगों के क्लब में शामिल है।

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लहर

एक दौर वह था जब मंत्री लंबी पारी बेफिक्र होकर खेलते थे, लेकिन आज का आलम यह है कि कोई भी मंत्री अपनी कुर्सी को लेकर आश्वस्त नजर नहीं आता। मंत्रियों के लिए हर गुजरता दिन एक राहत की सांस लेकर आता है कि चलो आज का दिन तो सलामत बीता। आखिरकार हर किसी की किस्मत केदार कश्यप जैसी तो होती नहीं, जो सत्ता की गाड़ी में लगातार 17 साल तक बिना किसी रुकावट के सवार रह सके। साय मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें यूं ही महज़ ख्याली पुलाव भी नहीं है। संगठन की गहरी समझ रखने वाले कद्दावर चेहरे भी इन सुगबुगाहटों पर दबी जबान से रज़ामंदी जता रहे हैं। रह-रहकर बदलाव की एक तेज लहर उठती जरूर है, पर किनारे तक पहुंचने से पहले ही थम जाती है। यह असमंजस का दौर तब तक यूं ही बना रहेगा, जब तक कि दिल्ली से ‘नंबर 1’ और ‘नंबर 2’ का कोई साफ संदेश न आ जाए, पर तब तक मंत्रियों के दिलों में उठते इस तूफान का क्या? कोई भी मंत्री ऐसा संत या आध्यात्मिक पुरुष तो है नहीं, जो अपनी कुर्सी का मोह त्यागकर खुद को दिलासा दे सके। बहरहाल आलम यह है कि जैसे ही मीडिया या सोशल मीडिया पर फेरबदल की सुर्खियां तैरती हैं, सहमे हुए हुक्मरानों के होठों पर अनायास ही ये पंक्तियां तैर जाती हैं- दिल में एक लहर सी उठी है अभी…

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हे राम 

सूबे की सरकार की पार्टी के एक बड़े नेता की पैरवी वाली चिट्ठी लेकर एक कार्यकर्ता मंत्री के बंगले पर पहुंचा। मामला कार्यकर्ता के परिवार से जुड़े एक तबादले का था। मंत्री जी ने चिट्ठी ली, उस पर कुछ लिखा और अपने पीए को थमाकर खुद बंगले के भीतर चले गए। कार्यकर्ता को लगा कि नेता जी के रसूख से काम पक्का हो गया। तभी पीए ने कार्यकर्ता को कोने में बुलाया और धीरे से कहा, देखो बाकियों से तो 5 लाख रुपये ले रहे हैं, तुम अपने आदमी हो इसलिए 3 लाख दे देना, काम हो जाएगा। पैसा ऊपर तक पहुंचाना होता है। कार्यकर्ता ने चौंककर पूछा, ऊपर तक का क्या मतलब? पीए मुस्कुराते हुए बोला, अरे भाई पार्टी-वार्टी में देना पड़ता है। कार्यकर्ता का खून खौल उठा। वह मंत्री बंगले से निकलकर सीधे नेता जी के पास जा धमका और तल्ख लहजे में बोला, नेता जी जब पैसा ही चाहिए था तो सीधे मुझसे कह देते, मंत्री के दर पर क्यों भिजवाया? नेता जी अपने ही कार्यकर्ता की तुनकमिजाजी देखकर अवाक रह गए। उन्होंने तो पूरी सहृदयता से मंत्री के नाम सिफारिशी चिट्ठी लिखी थी। नेता जी ने कार्यकर्ता को शांत कराया और इत्मीनान से पूरा मामला समझा। सच्चाई सामने आते ही वह खुद अपना सिर पकड़कर बैठ गए। नेता जी ने गहरी सांस ली और बुदबुदाए- हे राम हम समझते रहे कि हमारी सिफारिश में बड़ा वजन है, पर यहां तो मेरी पूरी सियासत की औकात सिर्फ दो लाख रुपये के डिस्काउंट तक ही सिमट कर रह गई।

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टपकता सच

बारिश अच्छे-अच्छों के दावों को धो देती है और चमकदार दिखने वाली सरकारी इमारतों की कलई खोल कर रख देती है। इन इमारतों को तराशने वाले भी लगातार होती बारिश से थोड़े परेशान तो ज़रूर होते होंगे कि कहीं पोल ज़्यादा न खुल जाए। मुद्दे की बात यह है कि विधानसभा के मानसून सत्र के ठीक पहले जब सदन पानी-पानी हुआ, तो काफी हो-हल्ला मचा था। आनन-फानन में सब दुरुस्त किया गया पर अब खबर मंत्रियों के नए-नवेले बंगलों से आ रही है, जहां छत खूब चू रहा है। बीते दिनों एक मंत्री अपने दफ़्तर में अपनी कुर्सी टेबल के सेंटर से जरा सा साइड खिसकाकर बैठी थी। लोगों ने पूछा, आज कुर्सी कोने में क्यों? तो उन्होंने चुपचाप ऊपर से टपकती बूंदों की तरफ उंगली उठा दी। एक मंत्री जी तो ऐसे विभाग के मुखिया हैं जिसका काम ही लोगों का गला तर करना है। बारिश का पानी हर दिन उनका बंगला तर कर रहा है। सुना है उनके बंगले का हाल सबसे ज़्यादा बेहाल है। टप-टप की सबसे तेज लयबद्ध आवाजें उसी बंगले से गूंज रही है। शायद बाकी मंत्रियों के बंगलों की दास्तान भी इससे कुछ अलग नहीं होगी। खैर, इन बंगलों को आकार देने वाले ठेकेदार की जड़ें सत्ता की दहलीज में इतनी गहरी धंसी हैं कि मंत्री खुलकर बोलने से बचते दिखते हैं। सो काम बस खामोश इशारों और खिसकती कुर्सियों से ही चलाया जा रहा है और इन सबके बीच मंत्रियों के बंगलों से टपकते सच को हर कोई खुली आंखों से देख रहा है। 

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दुविधा

पिछले दिनों संगठन ने मंत्रियों को उनके प्रभार जिलों के दौरे पर नहीं जाने को लेकर फटकार लगाई थी। यह फटकार संगठन के नेताओं की शिकायत पर लगी थी। संगठन के एक बड़े नेता ने एक मंत्री से यह तक कह दिया था कि क्यों न आपकी जिम्मेदारी ही बदल दी जाए? खैर, इन सबके बीच एक दूसरे मंत्री बेहद आहत दिखे। मंत्री बोले, कहां फंस गया हूं? न जाने कैसे इस झंझट से मुक्ति मिलेगी। अपनी विधानसभा देखूं या प्रभार जिला। मंत्री को अपने इलाके से बेहद प्रेम है। मंत्री की हैसियत से उनकी मौजूदगी जितनी राजधानी और दूसरे इलाकों में नहीं पाई जाती, उससे ज्यादा वक्त तक वह अपने इलाके में पाए जाते हैं। वह इस बात को बखूबी समझ रहे हैं कि ज़मीन हैं, तो जहां है। इसलिए वह राजधानी आते तो हैं, लेकिन छू कर लौट जाते हैं। प्रभार-वभार के झंझट ने उनका सिरदर्द बढ़ा दिया है। वह अब दुविधा में रहने लगे हैं कि कैसे समय निकालकर प्रभार जिले के दौरे पर जाए? 

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धर्म सम्राट !

जब धर्म आस्था का विषय न रहकर जमीन नापने का फीता बन जाए, तो समझ लीजिए कि शहर का कोई भू-माफिया ‘धर्म सम्राट’ बन बैठा है। सत्ता की आंखों पर वैसे तो दूरबीन चढ़ी रहती है, लेकिन धर्म का मुखौटा सामने आते ही वे अचानक मोतियाबिंद का शिकार हो जाती हैं। शहर भर में लोहे की ऊंची मीनारों पर टंगे होर्डिंग्स को ही देख लीजिए। एक कथित ‘धर्म सम्राट’ की विशाल तस्वीर के साथ छोटी-छोटी तस्वीरों में सिमटे सत्ता नायकों के चेहरे साफ देखे जा सकते हैं। सड़कों से गुजरते क़ाफ़िले में बैठे सत्ताधीशों ने शायद खिड़की से बाहर झांककर इन होर्डिंग को देखा होगा और सोचा होगा कि भू माफिया का कटआउट हमसे बड़ा है। उसके आयोजन का प्रचार हमारे सरकारी आयोजन के प्रचार से बड़ा है। भीड़ भी हमारे सरकारी  आयोजन से बड़ी है…फिर यह सोचकर उन्होंने खुद को तसल्ली दी होगी कि आख़िर वोट तो इसी भीड़ से ही मिलना है। इस धार्मिक आयोजन के आयोजक की पृष्ठभूमि पर अगर कोई सवाल उठाए, तब आयोजक के चेहरे पर लगा धर्म का मुखौटा आगे आ जाएगा। जमीन के धंधे से उसके जुड़ाव की बात हो, तो यह मालूम चल जाएगा कि जुड़ाव बहुत गहरा है। इतना गहरा कि अब राजस्व के कागज़ भी शायद धर्म की भाषा समझने लगे हैं। आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन कंठी और मंच मिलते ही सत्ता की नजर में व्यक्ति का परिचय बदल जाता है। इस किस्म के भू-माफिया के आगे सत्ता का झुकना ही उसे चरित्र प्रमाण पत्र देना है। विडंबना यह है कि धर्म के नाम पर चलने वाली सत्ता धर्म के मूल स्वरूप को देखने के बजाय उसके इस मुखौटे को नमन कर रही है। उसे चेहरे की चमक तो दिख रही है, लेकिन पीछे की गहरी परछाई नहीं। हालांकि इन तस्वीरों के बरअक्स सत्ता के कुछ ज़िम्मेदार चेहरे इस आयोजन से इत्तेफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि धर्म अगर सचमुच धर्म है, तो उसे सत्ता के सहारे की जरूरत नहीं और सत्ता अगर सचमुच सत्ता है, तो उसे किसी धार्मिक मुखौटे के आगे घुटने टेकने की ज़रूरत नहीं। वरना कल इतिहास यही लिखेगा कि एक दौर ऐसा भी आया था, जब किसी भू-माफिया को ‘धर्म सम्राट’ बनने के लिए अपना चरित्र नहीं, सिर्फ़ मुखौटा बदलना पड़ा था और सत्ता ने भी बिना कोई सवाल किए बगैर उस मुखौटे के आगे शीश नवाना स्वीकार कर लिया था।

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