Bihar News: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कल शनिवार को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं के सशक्तिकरण पर अपनी बात रखते हुए कहा कि, भाजपा और आरएसएस के लोग चाहते हैं कि लड़कियां और महिलाएं पिंजरे में बंद रहें। राहुल के इस बयान पर बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी की प्रतिक्रिया सामने आई है।
पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान मिथिलेश तिवारी ने कहा कि, राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में प्रियंका गांधी को अभी तक दर्जा नहीं दे पाए हैं। अगर प्रियंका गांधी को वो आगे बढ़ाकर खुद पीछे हटते हैं, तब तो उनको ये बात बोलने में ठीक लगेगा।
‘मनुस्मृति से आता है महिलाओं को दबाने का माइंडसेट’
दरअसल ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि, महिलाओं को दबाने का माइंडसेट मनुस्मृति से आता है और आज हमारी लड़ाई इसी माइंडसेट से है। उन्होंने कहा कि, BJP-RSS के लोग चाहते हैं कि लड़कियां/महिलाएं पिंजरे में बंद रहें। लेकिन हम ऐसा हिंदुस्तान नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि सम्मान सभी का हो।
राहुल गांधी ने कहा कि, हमारे देश में Disrespct कई तरीके का है। उन्होंने कहा कि, समाज में शर्म के कारण Sexual violence के 99% मामले रिपोर्ट ही नहीं होते है। काम करने के लिए 84% महिलाओं को घर से परमिशन लेनी पड़ती है। काम में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को 25% कम सैलरी मिलती है और आसानी से प्रमोशन नहीं मिलता।
राहुल ने कई लड़कियों के साथ साझा किया मंच
कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने कई महिलाओं और लड़कियों के साथ मंच भी साझा किया। इस दौरान शेख आमना नाम की छात्रा ने बताया कि, देश में आज भी कई परिवार अपनी बेटियों को इसलिए नहीं पढ़ा रहे हैं, क्योंकि वो ‘लड़की’ है। उन्होंने कहा कि, कई लोगों को लगता है कि अगर लड़की पढ़-लिख गई तो इकोनॉमिकली इंडिपेंडेंट हो जाएगी, जिससे लड़कियों पर उनका कंट्रोल खत्म हो जाएगा।
सवाल करने पर मिलता है ‘चरित्र का सर्टिफिकेट’- नेहा सिंह राठौर
‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में बिहार की लोक गायिका नेहा सिंह राठौर भी पहुंची थी। उन्होंने मंच से कहा कि, मैं सरकार से उन तमाम मुद्दों पर सवाल पूछती हूं, जो सरकार को पसंद नहीं आते। इसके बदले मुझे ढेर सारी गालियां और FIR झेलनी पड़ती हैं। नेहा ने कहा कि, लोकतंत्र में अगर हम अपने प्रधानमंत्री से सवाल नहीं पूछ सकते, तो फिर यह कैसी आज़ादी और कैसा लोकतंत्र है? मुझे लगता है कि एक महिला के लिए समाज में अपनी पहचान बनाना और सामाजिक मुद्दों पर मुखर होकर बोलना बेहद मुश्किल है। जैसे ही कोई महिला अपनी आवाज उठाती है, उसके सवालों का जवाब देने के बजाय उसे ‘चरित्र का सर्टिफिकेट’ दे दिया जाता है।
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