लाल किला आतंकी मामले में आरोपित जासिर बिलाल वानी उर्फ दानिश को दिल्ली हाई कोर्ट से मंगलवार, 18 अगस्त को बड़ा झटका लगा। अदालत ने उसे डिफॉल्ट जमानत देने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उसकी अपील खारिज कर दी।
जासिर बिलाल ने दलील दी थी कि जांच एजेंसी ने कानून में निर्धारित समयसीमा के भीतर जांच पूरी नहीं की और न ही आरोपपत्र दाखिल किया। इसी आधार पर उसने डिफॉल्ट जमानत की मांग की थी।
एनआईए ने लगाया साजिश में शामिल होने का आरोप
जासिर बिलाल वानी जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग का रहने वाला है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का आरोप है कि वह 10 नवंबर 2025 को लाल किला इलाके में हुए कार बम धमाके की साजिश में सक्रिय रूप से शामिल था।
जांच एजेंसी ने मामले में उसकी भूमिका को गंभीर बताते हुए उसके खिलाफ आतंकवाद से जुड़े आरोपों की जांच की है। इसी मामले में जासिर ने निर्धारित अवधि में जांच पूरी न होने का हवाला देते हुए वैधानिक अधिकार के तहत डिफॉल्ट जमानत की मांग की थी।
क्या होती है डिफॉल्ट जमानत?
डिफॉल्ट जमानत उस स्थिति में मांगी जाती है, जब जांच एजेंसी कानून में निर्धारित अवधि के भीतर जांच पूरी करके आरोपपत्र दाखिल नहीं कर पाती। ऐसी स्थिति में आरोपी को कानून के तहत जमानत का अधिकार मिल सकता है, बशर्ते संबंधित कानूनी शर्तें पूरी हों।
हालांकि, जासिर बिलाल की इस दलील को दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
मामले में आगे क्या होगा?
दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद जासिर बिलाल वानी को फिलहाल डिफॉल्ट जमानत का लाभ नहीं मिलेगा। लाल किला धमाका मामले में जांच एजेंसी की कार्रवाई और मुकदमे की अगली कानूनी प्रक्रिया पर अब नजर रहेगी।
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