एक तरफ अमेरिका के खिलाफ ईरान पूरी ताकत से युद्ध लड़ रहा है. वहीं दूसरी तरफ आबादी के लिहाज से दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया ने घुटने टेकते हुए अपना कंट्रोल अमेरिका को देने का फैसला किया है. दरअसल, इंडोनेशिया ने अमेरिका के साथ एक रक्षा समझौता करने का फैसला लिया है. इस समझौते के तहत अमेरिका का फाइटर जेट बिना किसी परमिशन के आसानी से इंडोनेशिया के स्पेस में उड़ सकता है और लैंड कर सकता है. इससे संबंधित आशय पत्र तैयार किया जा रहा है.
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री और अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने एक मीटिंग में समझौते का प्रारूप तैयार किया. डील के कई हिस्सों को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जा रहा है कि इस डील से अमेरिका अपने मतलब के हिसाब से इंडोनेशिया का इस्तेमाल कर सकता है.
इंडोनेशिया ने क्यों अमेरिका के सामने टेके घुटने ?
- इस पूरे समझौते के पीछे अगस्त 2025 में इंडोनेशिया में सरकार के खिलाफ बगावत को देखा जा रहा है. उस वक्त वहां के राष्ट्रपति प्रबोवो अमेरिका के साथ हो गए थे. तब ट्रंप ने उनकी कुर्सी बचाने में उनकी मदद की थी. इसके बाद ट्रंप ने जब गाजा को लेकर बोर्ड ऑफ पीस की घोषणा की, तब इंडोनेशिया ने इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. शांति सैनिकों के नाम पर इंडोनेशिया ने अपने 8 हजार सैनिकों को भी भेजने का ऐलान किया.
- फरवरी महीने में इंडोनेशिया ने अमेरिका के साथ टैरिफ डील की थी. इस डील के बाद राष्ट्रपति प्रबोवो पर सवाल उठे थे. इंडोनेशिया के 65 संगठनों ने डील के खिलाफ याचिका दाखिल की थी. इन संगठनों का कहना था कि इंडोनेशिया ने अमेरिका के सामने सरेंडर करना शुरू कर दिया है. इंडोनेशिया की नीति इस तरह की पहले नहीं थी.
- गौरतलब है कि, समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक इंडोनेशिया के विदेश मंत्रालय ने इस डील का विरोध किया है. विदेश मंत्रालय का कहना है कि इस डील से क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है. इंडोनेशिया के विदेश मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर इसका विरोध जताया है. ऐसा पहली बार देखा जा रहा है, जब किसी डील को लेकर एक देश के 2 मंत्रालय आमने-सामने हैं. वो भी दोनों अहम मंत्रालय.
इंडोनेशिया अमेरिका के लिए अहम क्यों?
इंडोनेशिया दक्षिण चीन सागर और हिंद प्रशांत महासागर के केंद्र में स्थित है. यहां से आसियान देशों की मॉनिटरिंग आसानी से किया जा सकता है. इसके अलावा चीन के वर्चस्व को भी इंडोनेशिया से चुनौती दी जा सकती है. इंडोनेशिया एक वक्त में गुट निरपेक्ष आंदोलन का झंडेबरदार था, लेकिन 2020 के बाद अमेरिका के पक्ष में चला गया. प्रबोवो उस वक्त इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री थे. पिछले दिनों जकार्ता पोस्ट में एरिक जोन्स ने लिखा- प्रबोवो अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश करने में लगे हैं. इसके लिए उन्होंने इंडोनेशिया को दांव पर लगा दिया है.
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